रिकॉर्ड फसल के बाद यूपी में कोल्ड स्टोरेज पर दबाव, आलू भाव लागत से नीचे
रिकॉर्ड रबी फसल और भरते कोल्ड स्टोर ने यूपी के किसानों को संकट में डाला, थोक भाव लागत से नीचे — जबकि बंगाल और बिहार की तस्वीर अलग है।

देश के सबसे बड़े आलू उत्पादक उत्तर प्रदेश में इस रबी सीज़न की रिकॉर्ड फसल के बाद कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था पर दबाव साफ़ दिखा। फ़रवरी से अप्रैल के लोडिंग चरण में आगरा, फ़र्रुखाबाद, हाथरस और सीतापुर जैसे प्रमुख ज़िलों में भंडारगृह तेज़ी से भर गए, और कई जगह किसानों को जगह न मिलने पर लौटना पड़ा। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, बढ़ते तापमान के बीच फ़सल खराब होने की आशंका से किसान आलू से लदी ट्रॉलियों के साथ कोल्ड स्टोर के बाहर कतारों में खड़े रहे।
सरकार के अंतिम अनुमान के अनुसार 2024-25 में देश में लगभग 5.86 करोड़ टन आलू उत्पादन हुआ, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी क़रीब 35 प्रतिशत है। इस वर्ष आवक माँग से कहीं अधिक रही, और थोक भाव लागत से नीचे फिसल गए। बाज़ार आँकड़ों के अनुसार यूपी की कई मंडियों में थोक भाव गिरकर ₹7-8 प्रति किलो तक रहा — पिछले साल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कम। उत्पादन लागत ₹10 प्रति किलो से ऊपर आँकी गई, यानी बहुत-से किसान लागत तक नहीं निकाल पाए।
भंडारण का भूगोल
भंडारण का असमान वितरण इस दबाव को और गहरा करता है। फ़र्रुखाबाद-कन्नौज पट्टी देश की सबसे सघन कोल्ड स्टोरेज क्लस्टर मानी जाती है, जबकि आगरा बेल्ट — आगरा, फ़िरोज़ाबाद, हाथरस, अलीगढ़ और मथुरा — अकेले राज्य के क़रीब 30 प्रतिशत उत्पादन का स्रोत है। इन्हीं केंद्रों से भंडारण-निकासी का समय बड़ी हद तक तय करता है कि बेमौसम (ऑफ़-सीज़न) भाव किस दिशा में जाएँगे।
हर राज्य की अलग कहानी
भाव की तस्वीर हर राज्य में एक जैसी नहीं है। पश्चिम बंगाल में मज़बूत पैदावार और 30 टन प्रति हेक्टेयर से ऊपर उपज ने फार्मगेट भाव को लगभग ₹6 प्रति किलो तक दबाया, जबकि कोलकाता में खुदरा भाव कहीं ऊँचा बना रहा — आपूर्ति शृंखला की दूरी को उजागर करता है। इसके उलट बिहार में कोल्ड स्टोरेज क्षमता पतली है, इसलिए फ़सल तेज़ी से मंडियों से निकलती है और थोक भाव ₹11-14 प्रति किलो के अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर पर टिका रहा।
विश्लेषकों के अनुसार यह चक्र जाना-पहचाना है — कटाई के तुरंत बाद ग्लट में भाव गिरते हैं और स्टॉक घटने के साथ चढ़ते हैं। असली अड़चन असमान कोल्ड चेन और फ़सलोत्तर नुक़सान है। जब तक भंडारण क्षमता और निकासी का प्रबंधन संतुलित नहीं होता, छोटे किसान हर सीज़न इसी दबाव के बीच फँसे रहेंगे।


