ICAR-CPRI ने चार नई आलू क़िस्मों को मंज़ूरी दी — गंगा, नीलकंठ, अग्नि और शक्ति
ICAR-CPRI शिमला ने व्यावसायिक खेती के लिए चार नई आलू क़िस्में मंज़ूर कीं — कुफरी गंगा, कुफरी नीलकंठ, कुफरी अग्नि और कुफरी शक्ति — जो ऊँची उपज, बेहतर रोग-प्रतिरोध और प्रसंस्करण-उपयोग के लिए तैयार हैं।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने व्यावसायिक खेती के लिए चार नई आलू क़िस्मों को मंज़ूरी दे दी है — कुफरी गंगा, कुफरी नीलकंठ, कुफरी अग्नि और कुफरी शक्ति। ये क़िस्में ऊँची उपज, बेहतर रोग-प्रतिरोध और अलग-अलग उपयोगों — टेबल, चिप्स प्रसंस्करण और निर्यात — को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं, और आने वाले सीज़न में किसानों के पास विकल्प बढ़ाएँगी।
चारों क़िस्मों का ब्योरा
कुफरी गंगा खाने और प्रसंस्करण दोनों के लिए उपयुक्त है, 85–95 दिन में तैयार होती है और 35–42 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। कुफरी नीलकंठ मुख्यतः टेबल (खाने) क़िस्म है, 90–100 दिन की अवधि और 30–38 टन प्रति हेक्टेयर उपज के साथ। कुफरी अग्नि चिप्स प्रसंस्करण के लिए तैयार की गई है — 95–105 दिन में पकती है और 28–35 टन प्रति हेक्टेयर देती है, जो अनुबंध खेती में बेहतर दाम दिला सकती है। कुफरी शक्ति निर्यात-गुणवत्ता वाली क़िस्म है, 80–90 दिन की छोटी अवधि और 32–40 टन प्रति हेक्टेयर उपज के साथ।
किसानों को क्या फ़ायदा
सबसे बड़ा अंतर उपज का है — पुरानी क़िस्मों के मुक़ाबले 30–42 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन इन क़िस्मों को आर्थिक रूप से अधिक आकर्षक बनाता है। दूसरा, लेट ब्लाइट (पछेती झुलसा) और वायरस रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध से फफूँदनाशक पर ख़र्च घटता है। तीसरा, कुफरी अग्नि जैसी चिप्स-ग्रेड क़िस्म प्रसंस्करण कंपनियों के साथ अनुबंध खेती और चिप्स उद्योग में ऊँचे, स्थिर दाम का रास्ता खोलती है — जहाँ टेबल आलू की तुलना में बेहतर मूल्य मिलता है।
बीज कहाँ से मिलेगा
इन क़िस्मों का प्रमाणित बीज अगले रबी सीज़न (2026-27) से उपलब्ध होने की उम्मीद है। ब्रीडर और प्रमाणित बीज ICAR-CPRI शिमला तथा इसके क्षेत्रीय केन्द्रों — मोदीपुरम (मेरठ), जालंधर और पटना — से प्राप्त किया जा सकता है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के ज़रिए भी बीज वितरण की व्यवस्था रहती है। नई क़िस्म अपनाने से पहले किसानों को अपने क्षेत्र की मिट्टी, सिंचाई और बाज़ार-माँग के अनुसार चुनाव करना चाहिए, क्योंकि उपज और गुणवत्ता क्षेत्र एवं मौसम के साथ बदलती है।


