अरुणाचल के सुमसिंग में KVK की मदद से अब साल भर आलू की खेती
अपर सियांग KVK के मुफ़्त बीज-कंद कार्यक्रम और किसान ओयेम पारोन ताकु के चरणबद्ध बुवाई प्रयोग से साबित हुआ — सुमसिंग में आलू सिर्फ़ जाड़े में नहीं, साल भर उगाया जा सकता है।

अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग ज़िले के सुमसिंग गाँव में आलू लंबे समय से सिर्फ़ जाड़े की, किचन-गार्डन वाली फ़सल माना जाता था। गेकू स्थित अपर सियांग कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के लगातार प्रयास — और किसान का अपना चरणबद्ध बुवाई प्रयोग, पुरानी कुफरी ज्योति किस्म के साथ — यह दिखा चुका है कि गाँव के माइक्रोक्लाइमेट में यह फ़सल साल भर सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।
2021 से KVK क्या कर रहा है
गेकू स्थित अपर सियांग कृषि विज्ञान केंद्र, जो ICAR-IARI के उत्तर-पूर्वी पहाड़ी (NEH) आलू कार्यक्रम के तहत काम करता है, 2021 से वैज्ञानिक आलू खेती को बढ़ावा दे रहा है। इसके हस्तक्षेप के दो हिस्से हैं: सुधरी किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीज-कंद मुफ़्त में बाँटना, और किसानों को लगातार तकनीकी मार्गदर्शन देना।
इस हस्तक्षेप से पहले, सुमसिंग में आलू की खेती सिर्फ़ घरेलू इस्तेमाल के लिए छोटे किचन-गार्डन तक सीमित थी। किसान आमतौर पर स्थानीय बाज़ार से बिना यह जाने कि किस्म कौन-सी है, बीज-कंद ख़रीदते थे, और यह मानकर सिर्फ़ जाड़े में बुवाई करते थे कि आलू पूरी तरह रबी (जाड़े) की फ़सल है।
एक किसान का चरणबद्ध बुवाई प्रयोग
KVK के लाभार्थी किसानों में ओयेम पारोन ताकु ने कार्यक्रम से कुफरी ज्योति किस्म ली और साल के अलग-अलग समय पर बुवाई का प्रयोग शुरू किया। पिछले दो साल में उन्होंने बैच-वाइज़ चरणबद्ध बुवाई अपनाई — अलग-अलग समय पर अलग-अलग बैच बोकर हर एक की पैदावार पर बारीक़ी से नज़र रखी।
उनका निष्कर्ष: सुमसिंग में आलू बोने का कोई तय मौसम नहीं है। गाँव की ख़ास माइक्रोक्लाइमेटिक परिस्थितियों में आलू साल भर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। उन्होंने पाया कि फ़रवरी, मार्च और अप्रैल में बोई गई और जुलाई में काटी गई फ़सल में लगातार सबसे ज़्यादा पैदावार मिली, साथ ही कंद भी दूसरी बुवाई-अवधियों की तुलना में बड़े और बेहतर गुणवत्ता के थे।
उनकी सफलता बताती है कि वैज्ञानिक मार्गदर्शन को किसान के व्यावहारिक ज्ञान और नयापन अपनाने की इच्छा के साथ जोड़ना कितना ज़रूरी है। यह भी दिखाती है कि स्थान-विशेष फ़सल-प्रबंधन कभी-कभी सामान्य फ़सल-कैलेंडर से ज़्यादा असरदार हो सकता है। — अपर सियांग KVK की विज्ञप्ति
एक 1968 की किस्म आज भी क्यों असर दिखा रही है
कुफरी ज्योति ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की सबसे पुरानी जारी की गई किस्मों में से एक है, जो 1968 में अधिसूचित हुई थी और दशकों बाद भी व्यापक रूप से उगाई जाती है। नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड के आलू-किस्म संदर्भ के अनुसार, यह बड़े, अंडाकार, सफ़ेद छिलके और सफ़ेद गूदे वाली किस्म है, जो पहाड़ी परिस्थितियों में जल्दी पकती है, पहाड़ों में औसतन क़रीब 20 टन/हेक्टेयर पैदावार देती है, अगेती और पछेती झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है, भंडारण में धीरे ख़राब होती है, और प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त है।
KVK की विज्ञप्ति में यह सीधे कहा गया: कुफरी ज्योति भले पुरानी किस्म है, पर सुमसिंग की स्थानीय परिस्थितियों में इसने असाधारण प्रदर्शन किया — यह साबित करते हुए कि सही माइक्रोक्लाइमेट में एक अच्छी तरह अनुकूलित पुरानी किस्म नई किस्मों से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।
एक गाँव से आगे इसका क्या मतलब है
KVK की विज्ञप्ति ताकु के अनुभव को सिर्फ़ एक उदाहरण नहीं, बल्कि एक टेम्पलेट के रूप में देखती है: उम्मीद है कि उनका अनुभव सुमसिंग और अपर सियांग ज़िले की अन्य समान परिस्थितियों वाले क्षेत्रों के अधिक किसानों को एक ही जाड़े की फ़सल की बजाय साल भर आलू की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके पीछे की बात आलू से आगे भी लागू होती है — किसान के अपने मौसम-दर-मौसम अवलोकन पर आधारित स्थान-विशेष फ़सल-प्रबंधन, सामान्यीकृत क्षेत्रीय फ़सल-कैलेंडर से बेहतर नतीजे दे सकता है।
आलू किस्मों और बीज प्रणाली पर अन्य रिपोर्ट के लिए कुफरी अभेद्य और कुफरी रूबी की नई अधिसूचना देखें, और बीज लागत की पूरी जानकारी के लिए 1 बीघा में आलू बीज और लागत पढ़ें।


