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निर्यात ग्रेड कौन सी आलू किस्म देती है — यूपी और गुजरात के आँकड़े

निर्यातक किस्म नहीं, 55 मिमी से बड़ा कंद ख़रीदता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुफ़री फ्राइसोना 35.3 टन प्रति हेक्टेयर निर्यात ग्रेड देती है, गुजरात में कुफ़री चिप्सोना-3 सबसे आगे है।

इंडियन पोटैटो डेस्क · 14 सितंबर 2026 · 5 मिनट
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निर्यात गुणवत्ता वाले आलू का ढेर — 55 मिमी से बड़े कंद निर्यात ग्रेड में आते हैं

निर्यातक किस्म नहीं ख़रीदता। वह एक तय आकार से बड़े कंद ख़रीदता है, और बाक़ी का दाम टेबल आलू का देता है या लेता ही नहीं। इसलिए निर्यात बाज़ार के बारे में सोचने वाले के लिए असली सवाल यह नहीं कि कौन सी किस्म सबसे ज़्यादा पैदावार देती है — सवाल यह है कि कौन सी किस्म 55 मिमी से ऊपर सबसे ज़्यादा टन देती है। ये दो अलग सवाल हैं, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा गुजरात में इनके जवाब भी अलग हैं।

जहाँ पैसा बदलता है
55 मिमी
इस लेख का हर पैदावार आँकड़ा निर्यात ग्रेड पैदावार है — यानी 55 मिमी से बड़े कंदों की टन प्रति हेक्टेयर, कुल पैदावार नहीं। कोई किस्म कुल मिलाकर भारी हो सकती है और फिर भी इस सीमा के इस पार कमज़ोर बैठे।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्या निकलता है

परीक्षण अनुसंधान केंद्र के बजाय किसानों के अपने खेतों में हुए, और यह मायने रखता है — जो किस्म केंद्र के प्रबंधन में चमके और खेत के प्रबंधन में बैठ जाए, वह किसी काम की नहीं।

क्रमकिस्मनिर्यात ग्रेड पैदावार (टन/हे.)
1कुफ़री फ्राइसोना35.3
2कुफ़री गंगा31.8
3कुफ़री चिप्सोना-328.2
4कुफ़री संगम28.0
5कुफ़री बहार24.0

पहले और आख़िरी में फ़र्क़ है 11.3 टन प्रति हेक्टेयर — और यह उसी ग्रेड का माल है जिस पर निर्यातक ऊपर का दाम देता है। पाँच हेक्टेयर के खेत पर यह पचास टन से ज़्यादा बैठता है। ज़्यादातर किसान मानकर चलते हैं कि किस्म का चुनाव इतना बड़ा फ़र्क़ नहीं डाल सकता।

एक बात ध्यान देने लायक़: कुफ़री फ्राइसोना प्रसंस्करण किस्म है। उसका निर्यात ग्रेड की सूची में सबसे ऊपर आना याद दिलाता है कि "प्रसंस्करण किस्म" सिर्फ़ यह बताती है कि फ़ैक्ट्री उसमें क्या चाहती है, यह नहीं कि वह और कहाँ नहीं बिक सकती। बड़ा कंद बड़ा कंद है।

गुजरात में क्रम बदल जाता है

गुजरात में आलू का मौसम गंगा के मैदान से छोटा है, और सूची उसी हिसाब से बदलती है। वही आठ किस्में परखी गईं; ये चार निकलीं।

क्रमकिस्मनिर्यात ग्रेड पैदावार (टन/हे.)
1कुफ़री चिप्सोना-330.7
2कुफ़री संगम29.6
3कुफ़री गंगा27.2
4कुफ़री फ्राइसोना24.9

दोनों सूचियाँ साथ रखिए तो काम की बात अपने आप निकल आती है।

1 → 4
फ्राइसोना — यूपी से गुजरात
3 → 1
चिप्सोना-3 — यूपी से गुजरात
4 → 2
संगम — सबसे स्थिर

अगर आपको एक ऐसी किस्म चाहिए जो दोनों राज्यों में शर्मिंदा न करे, तो जवाब कुफ़री संगम है — गुजरात में दूसरे और यूपी में चौथे नंबर पर, और कभी अव्वल से बहुत दूर नहीं। अगर आप एक ही जगह उगाते हैं और वहाँ से सबसे ज़्यादा निर्यात माल चाहते हैं, तो उसी इलाक़े की अव्वल किस्म लीजिए। इसमें ग़लती की क़ीमत क़रीब दस टन प्रति हेक्टेयर है — उसी ग्रेड की, जो दाम देता है।

वे चार ज़िले जो इसी के लिए चुने गए

आलू निर्यात को बढ़ावा पूरे देश में बराबर नहीं दिया गया। इसके लिए चार ज़िले चुने गए, दोनों राज्यों में दो-दो — उत्तर प्रदेश में आगरा और फ़र्रुख़ाबाद, गुजरात में साबरकांठा और बनासकांठा

चुने हुए ज़िले में होने भर से ऑर्डर नहीं मिल जाता। इससे यह होता है कि ढाँचा एक जगह इकट्ठा हो जाता है — ग्रेडिंग, पैकिंग, माल जुटाना, और वे लोग जिन्हें पहले से पता है कि खेप कैसे बनती है। इनसे बाहर के किसान के लिए असली अड़चन आम तौर पर फ़सल नहीं होती। अड़चन यह होती है कि आसपास कोई ऐसा नहीं जो विदेशी ख़रीदार के मानक की खेप बना सके।

कुफ़री नीलकंठ ने निर्यातकों का ध्यान एक अलग तरह से खींचा है — थोक लाइन के रूप में नहीं, विशेष उत्पाद के रूप में। यह ऊपर की चार किस्मों से अलग प्रस्ताव है, जो इस पर बिकता है कि वह क्या है, इस पर नहीं कि 55 मिमी की छलनी से कितने टन निकलते हैं। जानने लायक़ है; सिर्फ़ रुचि के भरोसे पूरा खेत लगाने लायक़ नहीं।

ईमानदार बात — किस्म सबसे छोटी समस्या है

भारत इतना आलू उगाता है कि कहीं ज़्यादा निर्यात कर सके। अड़चन कभी मात्रा रही ही नहीं। भारतीय खेत और विदेशी ख़रीदार के बीच तीन चीज़ें हैं, और किस्म उनमें सबसे आसान है।

ये तालिकाएँ बताती हैं कि क्या लगाना है — तब, जब ख़रीदार पहले से हो। — निर्यात किस्म बिना ज़रिए के, बस अच्छा टेबल आलू है

आगे पढ़ें: व्यापार एवं बाज़ार की बाक़ी रिपोर्टें, आलू निर्यात कैसे करें — पूरी गाइड, और आज का आलू भाव

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत से निर्यात के लिए सबसे अच्छी आलू किस्म कौन सी है?
यह इलाक़े पर निर्भर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुफ़री फ्राइसोना सबसे ज़्यादा निर्यात ग्रेड देती है — 55 मिमी से बड़े कंदों की क़रीब 35.3 टन प्रति हेक्टेयर, उसके बाद कुफ़री गंगा 31.8, कुफ़री चिप्सोना-3 28.2, कुफ़री संगम 28.0 और कुफ़री बहार 24.0। गुजरात में क्रम बदल जाता है: कुफ़री चिप्सोना-3 सबसे आगे 30.7 टन, फिर कुफ़री संगम 29.6, कुफ़री गंगा 27.2 और कुफ़री फ्राइसोना 24.9। दोनों राज्यों में उगाना हो तो कुफ़री संगम सबसे भरोसेमंद रहती है।
निर्यात ग्रेड आलू का आकार कितना होता है?
55 मिलीमीटर से ऊपर। यही सीमा निर्यात ग्रेड को बाक़ी फ़सल से अलग करती है, और इसी वजह से निर्यातक को माल बेचने वाले के लिए कुल पैदावार का आँकड़ा भ्रामक होता है। कोई किस्म कुल मिलाकर भारी फ़सल दे सकती है और फिर भी उसका बहुत कम हिस्सा 55 मिमी से ऊपर निकले। निर्यात ग्रेड पैदावार — यानी 55 मिमी से बड़े कंदों की टन प्रति हेक्टेयर — वही आँकड़ा है जिस पर निर्यातक दाम तय करता है।
भारत में आलू निर्यात के लिए कौन से ज़िले चुने गए हैं?
चार — उत्तर प्रदेश में आगरा और फ़र्रुख़ाबाद, तथा गुजरात में साबरकांठा और बनासकांठा। किसी चुने हुए ज़िले में होने भर से निर्यात का ऑर्डर नहीं मिल जाता। इससे इतना होता है कि ग्रेडिंग, पैकिंग और माल जुटाने का ढाँचा एक जगह इकट्ठा रहता है, और ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें खेप बनाना आता है। इन ज़िलों से बाहर के किसान के लिए अड़चन अक्सर फ़सल नहीं, यह होती है कि आसपास कोई ऐसा नहीं जो विदेशी ख़रीदार के मानक की खेप बना सके।
क्या प्रसंस्करण वाली किस्म निर्यात में चल सकती है?
हाँ। कुफ़री फ्राइसोना और कुफ़री चिप्सोना-3 दोनों प्रसंस्करण किस्में हैं, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा गुजरात में क्रमशः निर्यात ग्रेड की सूची में सबसे ऊपर हैं। प्रसंस्करण किस्म का मतलब सिर्फ़ इतना है कि चिप्स या फ़्रेंच फ़्राइज़ की लाइन उसमें क्या चाहती है — ज़्यादा शुष्क पदार्थ और कम अपचायक शर्करा। यह इस बात पर रोक नहीं कि फ़सल और कहाँ बिक सकती है। ताज़ा निर्यात में कसौटी 55 मिमी से बड़ा कंद है, और ये किस्में वह देती हैं।
उत्पादन इतना होने के बावजूद भारत का आलू निर्यात कम क्यों है?
क्योंकि अड़चन कभी मात्रा रही ही नहीं। भारतीय खेत और विदेशी ख़रीदार के बीच तीन चीज़ें खड़ी हैं: ऐसी किस्म जो 55 मिमी से ऊपर पर्याप्त कंद दे, ऐसी उत्पादन और सुरक्षा पद्धति जो अवशेष और ट्रेसेबिलिटी पर आयातक देश को संतुष्ट करे, और ऐसा विपणन ज़रिया जो माल जुटा सके, ग्रेड कर सके, पैक कर सके और भेज सके। इनमें किस्म सबसे सस्ती और सबसे आसान है, और सीज़न में एक बार तय होती है। विपणन का ज़रिया ही वह जगह है जहाँ भारत की ज़्यादातर निर्यात कोशिशें दम तोड़ती हैं।
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भारत की आलू मूल्य शृंखला पर प्राथमिक-स्रोत आधारित रिपोर्टिंग — उत्पादन, भाव, भंडारण, प्रसंस्करण और व्यापार। यहाँ हर आँकड़ा किसी सरकारी, संस्थागत या सहकर्मी-समीक्षित स्रोत से जुड़ा होता है।

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