निर्यात ग्रेड कौन सी आलू किस्म देती है — यूपी और गुजरात के आँकड़े
निर्यातक किस्म नहीं, 55 मिमी से बड़ा कंद ख़रीदता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुफ़री फ्राइसोना 35.3 टन प्रति हेक्टेयर निर्यात ग्रेड देती है, गुजरात में कुफ़री चिप्सोना-3 सबसे आगे है।

निर्यातक किस्म नहीं ख़रीदता। वह एक तय आकार से बड़े कंद ख़रीदता है, और बाक़ी का दाम टेबल आलू का देता है या लेता ही नहीं। इसलिए निर्यात बाज़ार के बारे में सोचने वाले के लिए असली सवाल यह नहीं कि कौन सी किस्म सबसे ज़्यादा पैदावार देती है — सवाल यह है कि कौन सी किस्म 55 मिमी से ऊपर सबसे ज़्यादा टन देती है। ये दो अलग सवाल हैं, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा गुजरात में इनके जवाब भी अलग हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्या निकलता है
परीक्षण अनुसंधान केंद्र के बजाय किसानों के अपने खेतों में हुए, और यह मायने रखता है — जो किस्म केंद्र के प्रबंधन में चमके और खेत के प्रबंधन में बैठ जाए, वह किसी काम की नहीं।
| क्रम | किस्म | निर्यात ग्रेड पैदावार (टन/हे.) |
|---|---|---|
| 1 | कुफ़री फ्राइसोना | 35.3 |
| 2 | कुफ़री गंगा | 31.8 |
| 3 | कुफ़री चिप्सोना-3 | 28.2 |
| 4 | कुफ़री संगम | 28.0 |
| 5 | कुफ़री बहार | 24.0 |
पहले और आख़िरी में फ़र्क़ है 11.3 टन प्रति हेक्टेयर — और यह उसी ग्रेड का माल है जिस पर निर्यातक ऊपर का दाम देता है। पाँच हेक्टेयर के खेत पर यह पचास टन से ज़्यादा बैठता है। ज़्यादातर किसान मानकर चलते हैं कि किस्म का चुनाव इतना बड़ा फ़र्क़ नहीं डाल सकता।
एक बात ध्यान देने लायक़: कुफ़री फ्राइसोना प्रसंस्करण किस्म है। उसका निर्यात ग्रेड की सूची में सबसे ऊपर आना याद दिलाता है कि "प्रसंस्करण किस्म" सिर्फ़ यह बताती है कि फ़ैक्ट्री उसमें क्या चाहती है, यह नहीं कि वह और कहाँ नहीं बिक सकती। बड़ा कंद बड़ा कंद है।
गुजरात में क्रम बदल जाता है
गुजरात में आलू का मौसम गंगा के मैदान से छोटा है, और सूची उसी हिसाब से बदलती है। वही आठ किस्में परखी गईं; ये चार निकलीं।
| क्रम | किस्म | निर्यात ग्रेड पैदावार (टन/हे.) |
|---|---|---|
| 1 | कुफ़री चिप्सोना-3 | 30.7 |
| 2 | कुफ़री संगम | 29.6 |
| 3 | कुफ़री गंगा | 27.2 |
| 4 | कुफ़री फ्राइसोना | 24.9 |
दोनों सूचियाँ साथ रखिए तो काम की बात अपने आप निकल आती है।
अगर आपको एक ऐसी किस्म चाहिए जो दोनों राज्यों में शर्मिंदा न करे, तो जवाब कुफ़री संगम है — गुजरात में दूसरे और यूपी में चौथे नंबर पर, और कभी अव्वल से बहुत दूर नहीं। अगर आप एक ही जगह उगाते हैं और वहाँ से सबसे ज़्यादा निर्यात माल चाहते हैं, तो उसी इलाक़े की अव्वल किस्म लीजिए। इसमें ग़लती की क़ीमत क़रीब दस टन प्रति हेक्टेयर है — उसी ग्रेड की, जो दाम देता है।
वे चार ज़िले जो इसी के लिए चुने गए
आलू निर्यात को बढ़ावा पूरे देश में बराबर नहीं दिया गया। इसके लिए चार ज़िले चुने गए, दोनों राज्यों में दो-दो — उत्तर प्रदेश में आगरा और फ़र्रुख़ाबाद, गुजरात में साबरकांठा और बनासकांठा।
चुने हुए ज़िले में होने भर से ऑर्डर नहीं मिल जाता। इससे यह होता है कि ढाँचा एक जगह इकट्ठा हो जाता है — ग्रेडिंग, पैकिंग, माल जुटाना, और वे लोग जिन्हें पहले से पता है कि खेप कैसे बनती है। इनसे बाहर के किसान के लिए असली अड़चन आम तौर पर फ़सल नहीं होती। अड़चन यह होती है कि आसपास कोई ऐसा नहीं जो विदेशी ख़रीदार के मानक की खेप बना सके।
कुफ़री नीलकंठ ने निर्यातकों का ध्यान एक अलग तरह से खींचा है — थोक लाइन के रूप में नहीं, विशेष उत्पाद के रूप में। यह ऊपर की चार किस्मों से अलग प्रस्ताव है, जो इस पर बिकता है कि वह क्या है, इस पर नहीं कि 55 मिमी की छलनी से कितने टन निकलते हैं। जानने लायक़ है; सिर्फ़ रुचि के भरोसे पूरा खेत लगाने लायक़ नहीं।
ईमानदार बात — किस्म सबसे छोटी समस्या है
भारत इतना आलू उगाता है कि कहीं ज़्यादा निर्यात कर सके। अड़चन कभी मात्रा रही ही नहीं। भारतीय खेत और विदेशी ख़रीदार के बीच तीन चीज़ें हैं, और किस्म उनमें सबसे आसान है।
- किस्म। ऊपर की तालिकाओं से हल हो गई। यह फ़ैसला सीज़न में एक बार होता है, बिना अतिरिक्त ख़र्च के, और क़रीब दस टन प्रति हेक्टेयर निर्यात ग्रेड के बराबर है।
- मानक के अनुसार उत्पादन और सुरक्षा। विदेशी ख़रीदार अवशेष पूछता है, यह पूछता है कि क्या और कब छिड़का गया, और ट्रेसेबिलिटी माँगता है। यह जितनी कृषि तकनीक है उतनी ही रिकॉर्ड रखने का अनुशासन — और फ़सल खुदने के बाद इसे जोड़ा नहीं जा सकता।
- ख़रीदार तक पहुँचाना। विपणन का ज़रिया — माल जुटाना, ग्रेडिंग, पैकिंग, काग़ज़ात, शिपिंग। भारत की ज़्यादातर आलू निर्यात कोशिशें यहीं दम तोड़ती हैं, और कोई किस्म इसे ठीक नहीं करती।
ये तालिकाएँ बताती हैं कि क्या लगाना है — तब, जब ख़रीदार पहले से हो। — निर्यात किस्म बिना ज़रिए के, बस अच्छा टेबल आलू है
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