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मंडी एवं व्यापार

कोल्ड स्टोरेज से किसान का हिस्सा 9 अंक तक बढ़ता है — छह राज्यों के आँकड़े

छह आलू राज्यों में दो रास्तों की तुलना — खेत से सीधे बेचने वाला किसान, और कोल्ड स्टोर में रखकर बाद में बेचने वाला। भंडारण करने वाले के हाथ में उपभोक्ता के रुपये का बड़ा हिस्सा रहा, बिहार में 9 अंक ज़्यादा।

देवेंद्र कुमार झा · 15 अगस्त 2026 · 4 मिनट
कोल्ड स्टोर में रखे आलू के कट्टे — भंडारण और आलू के दाम में किसान का हिस्सा
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आलू खेत से निकलते ही एक घड़ी चालू हो जाती है। बिना भंडारण के उसके पास कुछ हफ़्ते हैं, और जिस किसान को इसी हफ़्ते बेचना है वह उस ख़रीदार के सामने मोल-भाव कर रहा है जिसे यह बात अच्छी तरह मालूम है।

छह आलू राज्यों के एक अध्ययन ने दो रास्तों की तुलना की — खेत से सीधे बेचने वाला किसान, और कोल्ड स्टोर में रखकर बाद में बेचने वाला। छहों राज्यों में भंडारण करने वाले के हाथ में उपभोक्ता के रुपये का बड़ा हिस्सा रहा। बिहार में 9 अंक ज़्यादा, पंजाब और झारखंड में 8, औसतन 6 अंक।

9 अंक
बिहार में किसान का हिस्सा बढ़ा
6 अंक
छह राज्यों का औसत
6 में 6
हर राज्य में बढ़ोतरी

उपभोक्ता का रुपया बँटता कैसे है

आलू खेत से रसोई तक पहुँचता है तो उपभोक्ता का रुपया तीन जगह बँटता है — किसान को क्या मिला, थोक व्यापारी ने क्या जोड़ा, दुकानदार ने क्या जोड़ा। यह बँटवारा तय नहीं है। यह इस बात से हिलता है कि सौदे की ज़रूरत किसे ज़्यादा है।

नीचे की तालिका में बाक़ी सब वैसा ही है। सिर्फ़ एक चीज़ बदली है — किसान ने खेत से सीधे बेचा, या पहले कोल्ड स्टोर में रखा।

राज्यसीधे बेचने पर किसान का हिस्साभंडारण के बादअंतर
बिहार54.6%63.6%+9.0 अंक
झारखंड58.2%66.6%+8.4 अंक
पंजाब56.2%64.3%+8.1 अंक
पश्चिम बंगाल62.6%66.7%+4.1 अंक
हरियाणा60.3%63.9%+3.6 अंक
उत्तर प्रदेश60.6%63.6%+2.9 अंक

ये आँकड़े 2016 के अध्ययन के हैं। हिस्से का अनुपात आज भी काम का है; रुपये के आँकड़े नहीं, इसलिए यहाँ नहीं दिए गए।

भंडारण दाम क्यों बदल देता है

कोल्ड स्टोरेज आलू को बेहतर नहीं बनाता। वह घड़ी हटा देता है।

वही किसान, वही आलू — पर अब वह पतली आवक वाले हफ़्ते का इंतज़ार कर सकता है। और कम दाम पर मना कर सकता है, जो असल में वह बात है जिससे आँकड़ा हिलता है।

भंडारण आलू का दाम नहीं बढ़ाता। वह 'ना' कहने की क़ीमत बढ़ाता है।

इसीलिए घटता हुआ हिस्सा थोक व्यापारी का है, दुकानदार का नहीं। बिहार में थोक का हिस्सा 18.7% से 12.1% रह गया, झारखंड में 21.8% से 11.8%। दुकान का काम नहीं बदला — छँटाई, सजावट, थोड़ा-थोड़ा बेचना सब वैसा ही है। बदला यह कि खेत पर ख़रीदने वाले के पास कितना मार्जिन बचता है।

फ़ायदा सबसे ज़्यादा कहाँ, और क्यों

छह राज्यों का यह पैटर्न बेतरतीब नहीं है। जहाँ किसान की शुरुआती स्थिति सबसे कमज़ोर थी, फ़ायदा वहीं सबसे बड़ा है।

एक लाइन में: भंडारण उस किसान के सबसे ज़्यादा काम आता है जिसकी मोल-भाव की ताक़त सबसे कम है। और कोल्ड स्टोरेज तक पहुँच आमतौर पर इसका उल्टा बँटी होती है।

सबसे ज़रूरी बात
हिस्सा बढ़ना, कमाई बढ़ना नहीं है
भंडारण का किराया, आना-जाना, महीनों बाद मिलने वाले पैसे का ब्याज और स्टोर में घटा वज़न — इनमें से कुछ भी हिस्से के हिसाब में नहीं आता।

यह आँकड़ा जो नहीं बताता

उपभोक्ता के रुपये में बड़ा हिस्सा मिलना और जेब में ज़्यादा पैसा आना, दोनों एक बात नहीं हैं।

तो सही निष्कर्ष सुर्खी से छोटा है — भंडारण यह तय करता है कि मार्जिन किसके पास रहेगा। किसान की जेब में ज़्यादा पहुँचा या नहीं, यह स्टोर के बिल और घटे वज़न पर निर्भर है, जो हर स्टोर और हर सीज़न में अलग होते हैं।

भाव और आवक की पूरी तस्वीर के लिए आलू भाव देखिए, और इसी तरह की रिपोर्टें मंडी एवं व्यापार में मिलेंगी। निर्यात की तरफ़ से यही सवाल भारत के ताज़ा आलू निर्यात की गिरावट में उठता है।

आगे की बात
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या कोल्ड स्टोरेज से आलू किसान की कमाई बढ़ती है?
उपभोक्ता जो दाम चुकाता है, उसमें किसान का हिस्सा बढ़ता है — बिहार में 9 अंक, पंजाब और झारखंड में 8, और छह राज्यों का औसत 6 अंक। पर रुपये में कमाई बढ़ी या नहीं, यह भंडारण के किराए, आने-जाने के भाड़े, देर से मिलने वाले पैसे के ब्याज और स्टोर में घटे वज़न पर निर्भर करता है। ये चारों हिस्से के हिसाब में नहीं आते।
भंडारण से किसान को मिलने वाला दाम बदलता क्यों है?
क्योंकि उससे तारीख़ की मजबूरी हट जाती है। बिना भंडारण वाला आलू कुछ हफ़्तों में बिकना ही है, और ख़रीदार को यह मालूम रहता है — दाम उसी जानकारी से तय होता है, आलू से नहीं। स्टोर में रखा आलू किसान को यह छूट देता है कि वह कम दाम पर मना कर दे और पतली आवक वाले हफ़्ते का इंतज़ार करे।
कोल्ड स्टोरेज से मूल्य शृंखला में किसका हिस्सा घटता है?
थोक व्यापारी का, दुकानदार का नहीं। बिहार में थोक का हिस्सा 18.7% से घटकर 12.1% रह गया और झारखंड में 21.8% से 11.8%। दुकान का काम वही है — छँटाई, सजाना, थोड़ा-थोड़ा बेचना। बदलता यह है कि खेत पर ख़रीदने वाले के पास कितना मार्जिन बचता है।
किन राज्यों में सबसे ज़्यादा फ़ायदा दिखा?
बिहार और झारखंड में — 9.0 और 8.4 अंक। इन्हीं दो राज्यों में थोक व्यापारी का हिस्सा शुरू में सबसे बड़ा था, यानी वापस लेने को ज़्यादा बचा था। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में सबसे कम — 2.9 और 3.6 अंक — क्योंकि वहाँ किसान पहले ही 60% से ऊपर था।
ये आँकड़े कितने पुराने हैं?
ये हिस्से 2016 के एक अध्ययन के हैं, जो 2026 के एक नीति पत्र में दोबारा छपे हैं। यानी एक दशक पुराने। इन्हें एक तरीक़ा समझने के लिए पढ़िए, आज के भाव की तरह नहीं। इसी वजह से इस लेख में रुपये-प्रति-क्विंटल के आँकड़े नहीं दिए गए हैं — दस साल में भाव बदल जाते हैं, हिस्से का अनुपात उतनी जल्दी नहीं बदलता।
कोल्ड स्टोरेजआलू भावकिसान की आयआलू विपणनमूल्य शृंखला
लेखक के बारे में
देवेंद्र कुमार झा
देवेंद्र कुमार झा
आलू उद्योग इंटेलिजेंस विशेषज्ञ

इंडियन पोटैटो के संस्थापक एवं निदेशक — आलू पर भरोसेमंद जानकारी (पोटैटो इंटेलिजेंस) और आलू से जुड़े हितधारकों का समुदाय खड़ा करने को समर्पित मंच। कृषि अभियांत्रिकी में बी.टेक; आलू के क्षेत्र के जानकार और इसके प्रति गहरा लगाव रखने वाले।

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