कोल्ड स्टोरेज से किसान का हिस्सा 9 अंक तक बढ़ता है — छह राज्यों के आँकड़े
छह आलू राज्यों में दो रास्तों की तुलना — खेत से सीधे बेचने वाला किसान, और कोल्ड स्टोर में रखकर बाद में बेचने वाला। भंडारण करने वाले के हाथ में उपभोक्ता के रुपये का बड़ा हिस्सा रहा, बिहार में 9 अंक ज़्यादा।

आलू खेत से निकलते ही एक घड़ी चालू हो जाती है। बिना भंडारण के उसके पास कुछ हफ़्ते हैं, और जिस किसान को इसी हफ़्ते बेचना है वह उस ख़रीदार के सामने मोल-भाव कर रहा है जिसे यह बात अच्छी तरह मालूम है।
छह आलू राज्यों के एक अध्ययन ने दो रास्तों की तुलना की — खेत से सीधे बेचने वाला किसान, और कोल्ड स्टोर में रखकर बाद में बेचने वाला। छहों राज्यों में भंडारण करने वाले के हाथ में उपभोक्ता के रुपये का बड़ा हिस्सा रहा। बिहार में 9 अंक ज़्यादा, पंजाब और झारखंड में 8, औसतन 6 अंक।
उपभोक्ता का रुपया बँटता कैसे है
आलू खेत से रसोई तक पहुँचता है तो उपभोक्ता का रुपया तीन जगह बँटता है — किसान को क्या मिला, थोक व्यापारी ने क्या जोड़ा, दुकानदार ने क्या जोड़ा। यह बँटवारा तय नहीं है। यह इस बात से हिलता है कि सौदे की ज़रूरत किसे ज़्यादा है।
नीचे की तालिका में बाक़ी सब वैसा ही है। सिर्फ़ एक चीज़ बदली है — किसान ने खेत से सीधे बेचा, या पहले कोल्ड स्टोर में रखा।
| राज्य | सीधे बेचने पर किसान का हिस्सा | भंडारण के बाद | अंतर |
|---|---|---|---|
| बिहार | 54.6% | 63.6% | +9.0 अंक |
| झारखंड | 58.2% | 66.6% | +8.4 अंक |
| पंजाब | 56.2% | 64.3% | +8.1 अंक |
| पश्चिम बंगाल | 62.6% | 66.7% | +4.1 अंक |
| हरियाणा | 60.3% | 63.9% | +3.6 अंक |
| उत्तर प्रदेश | 60.6% | 63.6% | +2.9 अंक |
ये आँकड़े 2016 के अध्ययन के हैं। हिस्से का अनुपात आज भी काम का है; रुपये के आँकड़े नहीं, इसलिए यहाँ नहीं दिए गए।
भंडारण दाम क्यों बदल देता है
कोल्ड स्टोरेज आलू को बेहतर नहीं बनाता। वह घड़ी हटा देता है।
वही किसान, वही आलू — पर अब वह पतली आवक वाले हफ़्ते का इंतज़ार कर सकता है। और कम दाम पर मना कर सकता है, जो असल में वह बात है जिससे आँकड़ा हिलता है।
भंडारण आलू का दाम नहीं बढ़ाता। वह 'ना' कहने की क़ीमत बढ़ाता है।
इसीलिए घटता हुआ हिस्सा थोक व्यापारी का है, दुकानदार का नहीं। बिहार में थोक का हिस्सा 18.7% से 12.1% रह गया, झारखंड में 21.8% से 11.8%। दुकान का काम नहीं बदला — छँटाई, सजावट, थोड़ा-थोड़ा बेचना सब वैसा ही है। बदला यह कि खेत पर ख़रीदने वाले के पास कितना मार्जिन बचता है।
फ़ायदा सबसे ज़्यादा कहाँ, और क्यों
छह राज्यों का यह पैटर्न बेतरतीब नहीं है। जहाँ किसान की शुरुआती स्थिति सबसे कमज़ोर थी, फ़ायदा वहीं सबसे बड़ा है।
- बिहार और झारखंड में सबसे ज़्यादा — 9.0 और 8.4 अंक। इन्हीं दोनों में थोक व्यापारी का हिस्सा शुरू में सबसे बड़ा था, 18.7% और 21.8%। मेज़ के उस पार ज़्यादा मार्जिन पड़ा था।
- उत्तर प्रदेश और हरियाणा में सबसे कम — 2.9 और 3.6 अंक। वहाँ किसान पहले ही 60% से ऊपर था। वापस लेने को कम बचा था।
- पंजाब अलग है — वहाँ थोक का हिस्सा छहों में सबसे कम है, 7 से 9%, पर दुकानदार का सबसे ज़्यादा, 35.2%। मार्जिन वहाँ दुकान के सिरे पर बैठा है, जहाँ भंडारण की पहुँच नहीं है।
एक लाइन में: भंडारण उस किसान के सबसे ज़्यादा काम आता है जिसकी मोल-भाव की ताक़त सबसे कम है। और कोल्ड स्टोरेज तक पहुँच आमतौर पर इसका उल्टा बँटी होती है।
यह आँकड़ा जो नहीं बताता
उपभोक्ता के रुपये में बड़ा हिस्सा मिलना और जेब में ज़्यादा पैसा आना, दोनों एक बात नहीं हैं।
- भंडारण मुफ़्त नहीं है। किराया, स्टोर तक और वापस लाने का भाड़ा, और महीनों तक न मिले पैसे का ब्याज।
- स्टोर में वज़न घटता है। जितना अंदर गया, उतना बाहर नहीं आता, और जो आता है उसकी ग्रेडिंग दोबारा होती है।
- सब इंतज़ार करें तो इंतज़ार बेकार है। पूरा ज़िला भंडारण कर ले तो जिस पतली आवक का इंतज़ार था, वह भी नहीं आती।
तो सही निष्कर्ष सुर्खी से छोटा है — भंडारण यह तय करता है कि मार्जिन किसके पास रहेगा। किसान की जेब में ज़्यादा पहुँचा या नहीं, यह स्टोर के बिल और घटे वज़न पर निर्भर है, जो हर स्टोर और हर सीज़न में अलग होते हैं।
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