आलू स्प्रे शेड्यूल — कब, कौन-सा और कितनी बार छिड़काव करें
आलू में छिड़काव का असली राज़ समय है — रोग आने से पहले निवारक संपर्क फफूंदनाशक, रोग दिखने पर सिस्टमिक, करीब 7 दिन का अंतराल, और CPRI के पूर्वानुमान के आधार पर ज़रूरत-भर छिड़काव।

आलू में छिड़काव को लेकर सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी यह है कि असली बात "कौन-सी दवा" है। दरअसल सबसे अहम बात समय है — सही समय पर किया गया निवारक छिड़काव, रोग फैलने के बाद के इलाज से कहीं ज़्यादा कारगर और सस्ता पड़ता है। इसीलिए स्प्रे शेड्यूल को एक तय कैलेंडर की तरह नहीं, बल्कि मौसम और रोग-जोखिम के अनुसार समझना चाहिए।
(ध्यान दें: यह लेख छिड़काव की रणनीति और समय समझाने के लिए है। किसी भी दवा की सटीक मात्रा और घोल हमेशा उत्पाद के लेबल और CPRI/कृषि विभाग की सलाह से ही लें — यहाँ जान-बूझकर मात्रा के आँकड़े नहीं दिए गए हैं।)
निवारक छिड़काव पहले
सबसे ज़रूरी सिद्धांत है — पहला छिड़काव रोग दिखने का इंतज़ार किए बिना करें। जब मौसम पछेती झुलसा के अनुकूल हो (ठंडा, नम, बादल वाला), तब संपर्क (कॉन्टैक्ट/प्रोटेक्टेंट) फफूंदनाशक जैसे मैंकोज़ेब का निवारक छिड़काव फसल पर एक सुरक्षा-परत बना देता है। यह दवा पत्तियों की सतह पर रहकर रोगाणु को जमने से रोकती है, इसलिए इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा रोग आने से पहले छिड़कने में है।
रोग दिखने पर
जैसे ही रोग के लक्षण दिखें या जोखिम बहुत बढ़ जाए, सिर्फ़ संपर्क दवा काफ़ी नहीं रहती। ऐसे में मेटालैक्सिल-वर्ग के सिस्टमिक (अंदर तक पहुँचने वाले) फफूंदनाशक को संपर्क दवा के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है। शोध और CPRI अनुभव दोनों यही दिखाते हैं कि पहले निवारक संपर्क छिड़काव और फिर रोग आने पर सिस्टमिक+संपर्क का संयोजन सबसे अच्छा नियंत्रण देता है।
CPRI का पूर्वानुमान — अंधाधुंध नहीं, ज़रूरत-भर
भारत में छिड़काव को समझदारी से करने का सबसे अच्छा औज़ार CPRI के झुलसा पूर्वानुमान मॉडल हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए बना JHULSACAST और उसका बेहतर, अखिल-भारतीय रूप INDO-BLIGHTCAST मौसम (तापमान और आर्द्रता) के आधार पर बताते हैं कि रोग कब आने की आशंका है और छिड़काव कब करना चाहिए। इसके साथ CPRI समय-समय पर सलाह (एडवाइज़री) भी जारी करता है। इनका फ़ायदा यह है कि किसान एक तय कैलेंडर पर अंधाधुंध छिड़काव करने के बजाय ज़रूरत के अनुसार छिड़काव करते हैं — इससे लागत घटती है, दवा का प्रतिरोध कम बनता है और पर्यावरण पर बोझ भी घटता है।
प्रतिरोध से बचाव और सही तरीका
एक ही फफूंदनाशक बार-बार छिड़कने से रोगाणु में प्रतिरोध पनप सकता है — इसलिए संपर्क और सिस्टमिक दवाओं को बदल-बदलकर इस्तेमाल करें। छिड़काव करते समय पत्तियों की निचली सतह तक दवा पहुँचाना ज़रूरी है, क्योंकि झुलसा अक्सर वहीं से शुरू होता है। और सबसे अहम — दवा की मात्रा, घोल और कटाई से पहले की प्रतीक्षा-अवधि हमेशा लेबल के अनुसार रखें। यह शेड्यूल किन रोगों के लिए है, यह समझने के लिए आलू में लगने वाले रोग और उनका इलाज ज़रूर देखें, और रोग-दबाव कम रखने के लिए सही रोपाई का समय भी अपनाएँ।


