असम में किसान उत्पादक कंपनियाँ दोगुनी होंगी, आलू की खेती भी बढ़ेगी: किसानों के लिए इसका मतलब
असम सरकार किसान उत्पादक कंपनियाँ (FPC) दोगुनी करना चाहती है और आलू की खेती बढ़ाने पर बात कर रही है। असम में आलू की पैदावार 7.6 टन प्रति हेक्टेयर है, देश में 24.6 टन।

असम सरकार ने क्या कहा?
असम के कृषि मंत्री पीयूष हज़ारिका ने 2 नवंबर 2026 को गुवाहाटी के खानापाड़ा में कृषि भवन में कृषि विभाग की समीक्षा बैठक ली। इसमें उन्होंने अफ़सरों से कहा कि राज्य में किसान उत्पादक कंपनियों (FPC) की संख्या दोगुनी करने के लिए काम करें। साथ ही स्कीमें समय पर लागू करने, ज़िम्मेदारी तय करने और गाँव स्तर पर किसानों से सीधे जुड़ने पर ज़ोर दिया।
मंत्री ने किसानों से सिर्फ़ धान पर टिके न रहकर ज़्यादा कमाई वाली फ़सलों की तरफ़ जाने को कहा, जैसे मखाना, अगरवुड, ऑयल पाम, नारियल, ड्रैगन फ्रूट और दूसरे फल-सब्ज़ियाँ। बैठक में राज्य के चार मिशन की समीक्षा हुई:
- मखाना मिशन
- ऑयल पाम मिशन (खाने के तेल के लिए)
- दलहन मिशन
- राजमा मिशन (बराक घाटी के लिए, अभी प्रस्ताव)
आलू पर अलग बैठक हुई। मंत्री एक ऐसी कंपनी से मिले जिसका प्लांट नलबाड़ी ज़िले में है। यह कंपनी पहले से असम के करीब 1,200 आलू किसानों से आलू ले रही है और उसे बड़ी मात्रा में लगातार आलू चाहिए। बात इस पर हुई कि राज्य में आलू की खेती कैसे बढ़े।
असम में आलू की खेती कितनी है?
असम में आलू रबी की फ़सल है, जो धान कटने के बाद लगती है। ताज़ा सरकारी आँकड़े (2024-25, तीसरा अग्रिम अनुमान):
| 2023-24 | 2024-25 | |
|---|---|---|
| रकबा | 1.06 लाख हेक्टेयर | 1.05 लाख हेक्टेयर |
| पैदावार (कुल) | 9.11 लाख टन | 7.98 लाख टन |
| प्रति हेक्टेयर | 8.6 टन | 7.6 टन |
रकबा लगभग उतना ही रहा, लेकिन प्रति हेक्टेयर पैदावार कम होने से कुल आलू घट गया।
असली मौक़ा पैदावार में है। असम का किसान एक हेक्टेयर से करीब 7.6 टन आलू निकालता है, जबकि देश का औसत 24.6 टन है। यानी असम देश के औसत के एक-तिहाई से भी कम निकाल रहा है। अगर यह फ़ासला थोड़ा भी कम हो, तो उसी ज़मीन से लाखों टन ज़्यादा आलू निकल सकता है। इसके लिए सही किस्म का सर्टिफ़ाइड बीज, धान के बाद समय पर बुवाई, संतुलित खाद और पक्का ख़रीदार चाहिए, और यही काम एक अच्छी किसान कंपनी अपने सदस्यों के लिए कर सकती है।
आलू किसान के लिए किसान कंपनी क्यों ज़रूरी है?
किसान उत्पादक कंपनी किसानों की अपनी कंपनी होती है, जो कंपनी क़ानून के तहत रजिस्टर होती है और सदस्यों के लिए खाद-बीज ख़रीदती है और उनकी फ़सल बेचती है। आलू में बीज सबसे बड़ा ख़र्च है और खुदाई के समय भाव बहुत गिरते हैं, इसलिए मिलकर काम करने से चार फ़ायदे होते हैं:
- बीज: कंपनी सर्टिफ़ाइड बीज थोक में, समय पर और सस्ते में ख़रीद सकती है।
- ख़रीदार: नलबाड़ी जैसे प्रोसेसर सैकड़ों अलग-अलग किसानों के बजाय एक कंपनी से तय किस्म और साइज़ का माल लेना पसंद करते हैं।
- स्टोरेज और ग्रेडिंग: सदस्य छँटाई, ग्रेडिंग और कोल्ड स्टोरेज साझा कर सकते हैं, ताकि खुदाई के समय सस्ते में सारा माल बेचना न पड़े।
- लोन और स्कीम: बैंक और सरकारी स्कीमें पूरी कंपनी को एक साथ लोन और मदद दे सकती हैं।
केंद्र की 10,000 FPO स्कीम में नई किसान कंपनी को तीन साल में मैनेजमेंट ख़र्च के लिए ₹18 लाख तक, हर किसान सदस्य पर ₹2,000 तक की बराबर इक्विटी ग्रांट (एक कंपनी को ₹15 लाख तक) और बैंक लोन पर ₹2 करोड़ तक की गारंटी मिल सकती है।
असम के आलू किसान अभी क्या करें?
- किसान कंपनी से जुड़ें या बनाएँ। अपने ज़िले के कृषि दफ़्तर या ATMA स्टाफ़ से पूछें कि आपके ब्लॉक में कौन-सी FPC काम कर रही है, या पड़ोसियों के साथ नई कैसे रजिस्टर करें।
- बीज पहले से तय करें। धान कटने के बाद बुवाई के समय से पहले ही उस किस्म का सर्टिफ़ाइड बीज बुक करें जो ख़रीदार चाहता है।
- बुवाई से पहले ख़रीदार से बात करें। नलबाड़ी में प्रोसेसर पहले से आलू ले रहा है, तो समूह पहले ही किस्म, साइज़ और मात्रा तय कर सकता है।
- हिसाब रखें। हर सदस्य का रकबा, बीज और पैदावार लिखकर रखें, इससे कंपनी को लोन, स्कीम और बेहतर सौदे मिलने में आसानी होती है।
स्रोत: इंडियन पोटैटो इंटेलिजेंस


