आलू भंडारण में एथिलीन: अंकुर रुकेंगे, पर क्या फ्राइज़ का रंग गहरा होगा?
CIPC पर रोक के बाद यूरोप में एथिलीन गैस से स्टोर किए आलू के अंकुर रोके जाते हैं, पर इससे शुगर बढ़कर फ्राइज़ गहरे हो सकते हैं। किस्म, गैस शुरू करने का तरीका और कार्बन डाइऑक्साइड नतीजा तय करते हैं।

एथिलीन एक गैस है जो स्टोर में रखे आलू को अंकुर निकलने से रोकती है। 2019 में यूरोप ने CIPC बंद किया, तब से वहाँ यह इसका मुख्य विकल्प बन गई है। पर चिप्स और फ्राइज़ के लिए यह सौदा दोधारी है: कई किस्मों में यही गैस वह शुगर भी बढ़ाती है जिससे फ्राइज़ का रंग गहरा हो जाता है।
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एथिलीन क्यों, और अभी क्यों
दशकों तक चिप्स और फ्राइज़ के लिए आलू रखने वाले स्टोर CIPC पर चलते रहे, एक केमिकल जिसका धुआँ (फ़ॉग) स्टोर में भरकर अंकुर रोके जाते हैं। यूरोपीय संघ ने जून 2019 में इसकी मंज़ूरी आगे नहीं बढ़ाई, जनवरी 2020 तक उत्पाद बाज़ार से हटवा दिए और स्टोरों को बचा माल इस्तेमाल करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा अक्टूबर 2020 तक का समय दिया। पुराने स्टोरों से इसका अवशेष साफ़ करना मुश्किल निकला, इसलिए यूरोप अब आलू में CIPC की 0.2 mg प्रति किलो की अस्थायी सीमा मानता है, जिसकी समीक्षा होती रहती है।
इससे यूरोप और ब्रिटेन के स्टोर दूसरे तरीकों की ओर गए। चलाने में एथिलीन सबसे सस्ते तरीकों में से एक निकली: गैस स्टोर में छोड़ी जाती है, आमतौर पर एक जनरेटर से, और पूरे सीज़न हल्के स्तर पर रखी जाती है। ब्रिटेन का किसानों के पैसे से चलने वाला आलू रिसर्च प्रोग्राम सालों से प्रोसेसिंग किस्मों पर इसे परख रहा है, और उसके नतीजे बताते हैं कि शीर्षक वाले सवाल का कोई एक जवाब क्यों नहीं है।
अंकुर कम, शुगर ज़्यादा: फ्राइज़ के रंग की दिक्कत
स्टोर में आलू ज़िंदा रहता है। एथिलीन उसकी आँखों (बड्स) को सुलाए रखती है, पर साथ ही आलू की साँस तेज़ कर देती है, और इससे उसके स्टार्च का कुछ हिस्सा ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ में बदल सकता है, जिन्हें रिड्यूसिंग शुगर कहते हैं। स्टोर किए आलू पर हुई रिसर्च में ठीक यही दिखा: लगातार एथिलीन ने अंकुर तो रोके, पर रिड्यूसिंग शुगर बढ़ा दी।
फ्रायर में यह शुगर अमीनो एसिड से मिलकर भूरी होती है, वही प्रतिक्रिया जिससे एक्रिलामाइड भी बनता है। शुगर ज़्यादा यानी चिप्स या फ्राइज़ गहरे और अक्सर कड़वे, और सिर्फ़ रंग की वजह से पूरा लॉट रिजेक्ट हो सकता है।
ब्रिटेन के भंडारण सलाहकारों ने कहा है कि चिप्स (क्रिस्प्स) वाली किस्मों के लिए यह जोखिम शायद इतना बड़ा है कि वहाँ एथिलीन न ही चलाई जाए, क्योंकि चिप्स का रंग शुगर के थोड़े से बदलाव पर भी बदल जाता है। फ्रेंच फ्राइज़ प्लांट के पास ज़्यादा गुंजाइश है: वे तलने से पहले ब्लांच करके कुछ शुगर निकाल सकते हैं।
सबसे ज़्यादा फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि गैस शुरू कैसे की जाती है। फ्राइज़ वाले आलू पर कनाडा की नौ सीज़न लंबी स्टडी में, जिसमें संटाना भी थी, जो भारत में भी फ्राइज़ के लिए उगाई जाती है, पाया गया कि गैस जल्दी शुरू करके डोज़ धीरे-धीरे बढ़ाने से फ्राइज़ का रंग सबसे कम बिगड़ा और अंकुर भी रुके रहे। सप्लाई में 18 घंटे की रुकावट, या दो दिन या उससे ज़्यादा की रुकावट से अंकुर पर पकड़ कमज़ोर हुई। बिना रुके चलती रही तो एथिलीन ने अंकुर CIPC जितने ही रोके, सिवाय 13 °C वाले स्टोरों के।

छिपा हुआ साथी: कार्बन डाइऑक्साइड और ताज़ी हवा
स्टोर किया आलू पूरे सीज़न कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। ब्रिटेन के ट्रायल दिखाते हैं कि अकेली कार्बन डाइऑक्साइड से फ्राइज़ का रंग नहीं बदला। पर हवा में ज़रा सी भी एथिलीन हो तो बदला: कार्बन डाइऑक्साइड जितनी ज़्यादा, फ्राइज़ उतने गहरे।
इसलिए एथिलीन चलाने वाले स्टोर को ताज़ी हवा से इतनी बार फ़्लश करना पड़ता है कि कार्बन डाइऑक्साइड कम रहे, और एथिलीन का स्तर भी ऊपर-नीचे न हो। एथिलीन ऐसी जगहों से भी आ सकती है जिनका किसी ने सोचा न हो: फ़ोर्कलिफ़्ट और फ़ॉगिंग मशीनों का धुआँ, या बगल का चैंबर जहाँ यह चल रही हो।
किस्म से तय होता है नतीजा
ब्रिटेन में बक्सों वाले स्टोर के ट्रायल में, जहाँ एथिलीन 10 ppm पर रखी गई, किस्में तीन समूहों में बँट गईं:
ये एक प्रोग्राम के ट्रायल के नतीजे हैं; बाद के सीज़न में फ़र्क़ कम मिला। भारत की मुख्य प्रोसेसिंग किस्मों, जैसे कुफ़री चिप्सोना-1, कुफ़री चिप्सोना-3 और कुफ़री फ्रायोएम, पर एथिलीन भंडारण का कोई प्रकाशित ट्रायल हमें नहीं मिला, इसलिए किसी एक नतीजे पर भरोसा करने से पहले ख़ुद परख लें।
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आपके पास कौन से रास्ते हैं
| तरीका | कैसे काम करता है | फ्राइज़ का रंग | भारत के रजिस्टर में, स्टोर किए आलू के लिए |
|---|---|---|---|
| एथिलीन, लगातार चालू | पूरे सीज़न हल्के स्तर पर गैस, धीरे-धीरे शुरू की गई | गहरा हो सकता है, किस्म और शुरुआत के तरीके पर निर्भर | दर्ज नहीं |
| एथिलीन के साथ 1-MCP | गैस शुरू होने से पहले 1-MCP आलू पर एथिलीन का असर रोक देता है | कुछ ट्रायल में शुगर बढ़ने से रोकी, कुछ में नहीं | 1-MCP सिर्फ़ सेब के लिए दर्ज |
| पुदीने (स्पीयरमिंट) का तेल | गरम फ़ॉग किया तेल जो अंकुर जला देता है | ट्रायल में प्रोसेसिंग क्वालिटी में गिरावट दर्ज नहीं | दर्ज नहीं |
| DMN (1,4-डाइमिथाइलनैफ़्थलीन) | आलू में कुदरती रूप से मिलने वाला यौगिक, स्टोर में फ़ॉग किया जाता है | ट्रायल में फ्राइज़ के रंग पर असर नहीं | दर्ज नहीं |
| CIPC (क्लोरप्रोफ़ाम) | फ़ॉग किया जाने वाला अंकुर रोकने का केमिकल | भारतीय ट्रायल में करीब 10 °C पर शुगर कम रखी | दर्ज |
| सिर्फ़ तापमान | ठंड अंकुर रोकती है पर शुगर बढ़ाती है; बाद में गरम करने से शुगर घट सकती है | बहुत ठंडे में रखा तो गहरा | किसी उत्पाद की ज़रूरत नहीं |
भारत के लिए इसका मतलब
भारत के कीटनाशक रजिस्टर में स्टोर किए आलू के लिए अंकुर रोकने वाला अकेला उत्पाद क्लोरप्रोफ़ाम है: 18 से 20 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति टन की दर से फ़ॉग किया जाता है, 10 ± 2 °C और 90 ± 5% नमी वाले कोल्ड स्टोर में, और इसके बाद 20 दिन का इंतज़ार ज़रूरी है। आलू भंडारण के लिए रजिस्टर में एथिलीन, पुदीने का तेल या DMN का कोई उत्पाद नहीं है।
दूसरा हथियार तापमान है। ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की एक स्टडी में कुफ़री चिप्सोना-1, कुफ़री चिप्सोना-2, कुफ़री बहार और कुफ़री ज्योति को धीरे-धीरे 12, 8 और 4 °C तक ठंडा किया गया: स्टोर 12 °C पर पहुँचा तो रिड्यूसिंग शुगर घटी, और 8 व 4 °C पर बढ़ी, जिससे चिप्स गहरे बने। एक और भारतीय स्टडी में पाँच किस्में CIPC के साथ 10 °C पर रखी गईं, और पाँच महीने बाद उनमें से तीन में रिड्यूसिंग शुगर 0.25% से नीचे रही।
निर्यात करने वालों के लिए एक और जाँच है: भारत में आलू पर CIPC के अवशेष की क़ानूनी सीमा 30 mg प्रति किलो है, जबकि यूरोप की अस्थायी सीमा 0.2 mg प्रति किलो। और पढ़ें: खुदाई से पहले की कौन सी बातें भंडारण की क्वालिटी तय करती हैं, और कुफ़री चिप्सोना-1 के चिप्स हर खेत में अलग क्यों बनते हैं (अंग्रेज़ी)।
एथिलीन कब ठीक बैठती है
- चिप्स से ज़्यादा फ्राइज़ के लिए, जहाँ प्लांट ब्लांच करके कुछ शुगर निकाल सकता है।
- उन किस्मों के लिए जिनका एथिलीन में रंग ठीक रहने का ट्रायल रिकॉर्ड है।
- उन स्टोरों में जो गैस को बिना रुकावट एक जैसा रख सकें और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकाल सकें।
- जहाँ बाज़ार CIPC का बहुत कम अवशेष माँगता है, जैसे यूरोप को निर्यात, और तब जब भारत में कोई रजिस्टर्ड उत्पाद आ जाए।
स्टोर मैनेजर के लिए चेकलिस्ट
अपनी किस्म को जानें। हर लॉट का भंडारण से पहले और फिर हर महीने टेस्ट फ्राई करें, और रिकॉर्ड रखें।
सिर्फ़ रजिस्टर्ड उत्पाद इस्तेमाल करें। भारत में आज इसका मतलब है कि अंकुर रोकने वाला जो भी उत्पाद डालें, उसके लेबल के हिसाब से डालें।
प्रोसेसिंग का माल ज़्यादा ठंडे में न रखें। भारतीय रिसर्च चिप्स की किस्मों के लिए करीब 10 से 12 °C बताती है, बीज आलू वाला 2 से 4 °C नहीं।
हवा पर नज़र रखें। कार्बन डाइऑक्साइड नापें, और इंजन, धुआँ और दूसरी गैसें प्रोसेसिंग वाले चैंबर से दूर रखें।
रीकंडीशनिंग की योजना बनाएँ। अगर आलू ठंडे में रखना ही पड़े, तो प्रोसेसिंग से पहले उसे गरम करें और रंग ठीक आने तक टेस्ट फ्राई करते रहें।
ख़रीदार की तरफ़ की कहानी के लिए पढ़ें: कम शुगर वाला आलू किसे कहते हैं (अंग्रेज़ी) और यूपी और पंजाब में संटाना के सॉलिड्स अलग क्यों (अंग्रेज़ी)।
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स्रोत
- Commission Implementing Regulation (EU) 2019/989, 17 जून 2019, क्लोरप्रोफ़ाम की मंज़ूरी आगे न बढ़ाना, EUR-Lex
- Commission Regulation (EU) 2025/1163, आलू में क्लोरप्रोफ़ाम की अस्थायी अवशेष सीमा, EUR-Lex
- केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड और पंजीकरण समिति (CIB&RC), Major Uses of Pesticides: Plant Growth Regulators (30 सितंबर 2025 तक)
- FSSAI, Food Safety and Standards (Contaminants, Toxins and Residues) Regulations, 2011, compendium version VIII, fssai.gov.in
- AHDB, प्रोजेक्ट R464, प्रोसेसिंग किस्मों पर एथिलीन के बेहतर इस्तेमाल की सिफ़ारिशें, archive.ahdb.org.uk
- AHDB, आलू स्टोर का माहौल: CO2 और प्रोसेसिंग क्वालिटी, horticulture.ahdb.org.uk
- AHDB, प्रोजेक्ट 11140043, प्रोसेसिंग बाज़ार के लिए अंकुर रोकने के दूसरे तरीके, archive.ahdb.org.uk
- Farmers Weekly, "How ethylene can help control sprouting in potato stores" (क्रिस्प्स के जोखिम और गैस शुरू करने पर AHDB के भंडारण विशेषज्ञ), fwi.co.uk
- Daniels-Lake, Prange, Kalt और Walsh, Potato Research 49(4): 303–326, एथिलीन देने के तरीके और प्रोसेसिंग रंग
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- Mahajan, Dhatt, Sandhu और Garg (2008), Journal of Food, Agriculture and Environment, CIPC और 10 °C पर भंडारण
- Mottram, Wedzicha और Dodson (2002), Acrylamide is formed in the Maillard reaction, Nature 419: 448–449


