बायोचार और आलू: क्या इससे सचमुच पैदावार बढ़ेगी?
बायोचार यानी फ़सल के कचरे से बना कोयला, जो मिट्टी में मिलाया जाता है। नॉर्वे में आलू पर तीन साल की जाँच में पैदावार नहीं बढ़ी — पर वहाँ की ज़मीन पहले से उपजाऊ थी। भारतीय मिट्टी में इसी चीज़ ने कार्बन आधे से ज़्यादा बढ़ाया।

बायोचार यानी फ़सल के कचरे को जलाकर बनाया गया कोयला — काला, भुरभुरा, जिसे मिट्टी में मिलाया जाता है। इसे "ज़्यादा पैदावार" के नाम पर बेचा जाता है। आलू के मामले में सीधी बात यह है: इससे पैदावार शायद न बढ़े, पर मिट्टी सुधर सकती है।
नॉर्वे में आलू पर तीन साल जाँच हुई और पैदावार में लगभग कुछ नहीं बढ़ा। पर वहाँ के खेत पहले से उपजाऊ थे। वहीं भारतीय मिट्टी में इसी चीज़ ने कार्बन आधे से ज़्यादा बढ़ा दिया।
कमज़ोर ज़मीन को फ़ायदा ज़्यादा है, अच्छी ज़मीन को कम। पूरी बात एक लाइन में यही है।
अगर आपकी ज़मीन थकी हुई, बलुई और जैविक तत्व में कमज़ोर है, तो बायोचार समझने लायक़ चीज़ है। अगर आपकी ज़मीन पहले से काली, ताक़तवर और जानदार है, तो इस सीज़न की फ़सल पर इसका असर कम ही रहेगा।
बायोचार असल में है क्या
फ़सल का कचरा लीजिए — पराली, भूसी, लकड़ी, गोबर। इसे बंद गड्ढे या ड्रम में जलाइए, जहाँ हवा लगभग न पहुँचे। यह राख नहीं बनता। कोयला बनता है।
वही कोयला बायोचार है। दो बातें इसे काम का बनाती हैं। इसमें बहुत छोटे-छोटे छेद होते हैं, स्पंज की तरह, इसलिए यह पानी और खाद को थामे रखता है, बहने नहीं देता। और इसका कार्बन ऐसे सख़्त रूप में होता है जो एक सीज़न में सड़ता नहीं — यानी हरी खाद की तरह ग़ायब नहीं होता, सालों खेत में बना रहता है।
यह खाद नहीं है। यह पौधे को खाना नहीं देता। इसे ऐसा बर्तन समझिए जो आपकी डाली हुई खाद और पानी को थामे रखता है।
नॉर्वे में आलू पर जाँच हुई। कुछ ख़ास नहीं निकला।
नॉर्वे की सरकारी संस्था NIBIO ने तीन साल यह जाँच की — एक छोटा प्लॉट और दो पूरे खेत, जिनमें आलू और अनाज की अदला-बदली चलती रही।
नतीजा, परियोजना प्रमुख एल्ड्रिड लाइन मोल्टेबर्ग के शब्दों में: जिन खेतों में बायोचार पड़ा और जिनमें नहीं पड़ा, दोनों की पैदावार में कोई मतलब का फ़र्क़ नहीं निकला। सिर्फ़ एक बड़े खेत में, रोमेडाल में 2022 में, थोड़ी बढ़त मिली। बाक़ी हर जगह असर छोटा या धुँधला रहा।
उन्होंने ज़्यादा मात्रा भी आज़माई, गोबर-घोल के साथ रखा बायोचार भी, और ख़ास चिकनी मिट्टी मिला महँगा बायोचार भी। इनमें से कोई भी सादे बायोचार से बेहतर नहीं निकला।
हिसाब देख लीजिए: NIBIO अपनी मात्रा डेकार में बताता है, जो नॉर्वे की इकाई है। एक डेकार 1,000 वर्ग मीटर यानी हेक्टेयर का दसवाँ हिस्सा। तो 10 से गुणा कीजिए। सामान्य मात्रा: 400 किलो प्रति डेकार × 10 = 4 टन प्रति हेक्टेयर। ज़्यादा मात्रा: 2 टन प्रति डेकार × 10 = 20 टन प्रति हेक्टेयर।
यह जाँच भारत के लिए फ़ैसला क्यों नहीं है
NIBIO ने अपने खेतों के बारे में ख़ुद क्या लिखा है, वह पढ़िए: उपजाऊ मिट्टी, पहले से अच्छी खेती-हालत में। ताक़तवर ज़मीन। ठंडा मौसम। बारिश भरपूर।
बायोचार का काम है पानी थामना, खाद थामना और कार्बन बढ़ाना। अगर मिट्टी ये तीनों पहले से ठीक कर रही है, तो बायोचार के लिए सुधारने को बचता ही क्या है? यह उस आदमी को दवा देने जैसा है जो बीमार ही नहीं।
NIBIO ख़ुद यही कहती है — कमज़ोर मिट्टी में या सूखे हालात में असर ज़्यादा हो सकता है। और यही बात भारत की बहुत सारी ज़मीन पर लागू होती है।
भारतीय मिट्टी में ICAR ने क्या नापा
ICAR-IISS भोपाल — सरकार की मिट्टी विज्ञान संस्था — ने 2021 से 2023 तक काली कपास मिट्टी में अपनी जाँच की। ICAR की इस जाँच में जैसे-जैसे मात्रा बढ़ी, मिट्टी का कार्बन भी बढ़ा:
| कितना बायोचार | मिट्टी का कार्बन | क्या मतलब |
|---|---|---|
| कुछ नहीं (नियंत्रण) | 0.58% | बीच की मिट्टी — जैसी ज़्यादातर भारतीय खेतों की है |
| 4 टन प्रति हेक्टेयर | 0.74% | वही मात्रा, जिससे नॉर्वे में कुछ नहीं हुआ |
| 8 टन प्रति हेक्टेयर | 0.96% | कार्बन दो-तिहाई बढ़ा — अब अच्छी मिट्टी की श्रेणी में |
ICAR ने यह भी दर्ज किया कि जहाँ बायोचार को आम NPK खाद और गोबर की खाद के साथ डाला गया, वहाँ क़रीब 10% ज़्यादा पैदावार मिली। पर यह बात साफ़ रहनी चाहिए: वह 10% वाला आँकड़ा धान का है, आलू का नहीं। धान के आँकड़े को आलू का बताकर पेश करना हम नहीं करेंगे।
हाँ, कार्बन वाला नतीजा मिट्टी के बारे में है। वह उसमें जो भी बोया जाए, उस पर लागू होता है — आलू पर भी।
अपनी मिट्टी के कार्बन का आँकड़ा नहीं पता?
हमसे पूछिएदोनों जाँचों को जोड़ने वाली लाइन यह है। ICAR के अपने वैज्ञानिक लिखते हैं कि बायोचार कम और मध्यम उपजाऊ मिट्टी में ज़्यादा असरदार होता है। नॉर्वे की मिट्टी ताक़तवर थी, इसलिए कम असर हुआ। भोपाल की मिट्टी बीच की थी, इसलिए ज़्यादा। दोनों नतीजे सही हैं।
तो आपकी आलू की फ़सल के लिए इसका क्या मतलब
पहले वह बात, जो छिपानी नहीं चाहिए: भारत में आलू पर बायोचार की जाँच अब तक किसी ने करके नतीजा नहीं छापा। ICAR का काम धान और गेहूँ पर है। ओडिशा में किसानों के खेतों पर जो जाँच हुई, वह धान, कपास, अरहर और भिंडी पर है। इसलिए जो कोई आपको भारतीय हालात में आलू की पैदावार का पक्का आँकड़ा बताए, वह अंदाज़ा लगा रहा है।
जो बात ईमानदारी से कही जा सकती है वह यह है। भारत की आलू पट्टी का बड़ा हिस्सा बलुई दोमट मिट्टी पर है — ऐसी मिट्टी जिसमें पानी जल्दी निकल जाता है और खाद टिकती नहीं। NIBIO का अपना कहना है कि बायोचार का सबसे ज़्यादा फ़ायदा ऐसी ही बलुई मिट्टी में पानी थामने और कटाव रोकने में होता है। यह देखने-परखने की वजह है। सबूत नहीं है।
पैसा लगाने से पहले दो काम की बातें
- कहाँ डालना है, यह इस पर टिका है कि क्यों डाल रहे हैं। ICAR साफ़ कहता है: उपजाऊपन बढ़ाना है तो बायोचार ऊपरी मिट्टी और जड़ वाले हिस्से में मिलाइए, जहाँ जड़ें खाती हैं। सिर्फ़ कार्बन जमा करना हो तभी गहराई में डालिए। गोबर की खाद या कम्पोस्ट के साथ मिलाकर डालना अकेले डालने से बेहतर रहता है — भोपाल में इसी तरह डाला गया था।
- यह खेत के पास ही बनना चाहिए। 4 से 8 टन प्रति हेक्टेयर की चीज़ दूर से ढोकर नहीं लाई जा सकती। ICAR के वैज्ञानिक इसी को भारतीय किसानों के इस्तेमाल न करने की मुख्य वजह बताते हैं — साथ में जानकारी की कमी भी। अगर आपके आसपास बनता ही नहीं, तो फ़िलहाल सवाल अपने आप हल हो जाता है।
आलू के फ़सल-चक्र के लिए बायोचार, कम्पोस्ट या कोई और सुधार सोच रहे हैं? अपना ज़िला, मिट्टी का प्रकार और मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर लिखा जैविक कार्बन का आँकड़ा भेजिए। हम बताएँगे कि आपकी हालत के लिए भारत का प्रकाशित शोध असल में क्या कहता है — और कहाँ जाकर वह चुप हो जाता है।
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