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आलू की खेती में ड्रिप सिंचाई के फ़ायदे — पानी, पैदावार और सब्सिडी का पूरा हिसाब

ICAR के एक ट्रायल में ड्रिप सिंचाई से आलू की पैदावार फरो सिंचाई के मुक़ाबले क़रीब 32% ज़्यादा मिली — साथ ही पानी की बचत और PMKSY के तहत 55% तक सब्सिडी भी।

देवेंद्र कुमार झा · 02 अगस्त 2026 · 4 मिनट
भाषाहिन्दीEnglish
आलू के खेत में मेड़ों के साथ बिछी ड्रिप सिंचाई की पाइपलाइन

भारत के ज़्यादातर आलू के खेतों में आज भी फरो सिंचाई होती है — मेड़ों के बीच पानी भरकर जड़ तक पहुँचाया जाता है। यह सस्ती और जानी-पहचानी तकनीक है, पर इसका बड़ा हिस्सा पानी जड़ क्षेत्र से नीचे बहकर बर्बाद हो जाता है। ड्रिप सिंचाई — छिद्रित पाइप से सीधे जड़ तक धीमी गति से पानी पहुँचाने वाली तकनीक — अब पंजाब जैसे भूजल-संकट वाले इलाक़ों में और तेज़ी से चर्चा में है, साथ ही एक परिपक्व हो चुकी केंद्रीय सब्सिडी योजना के सहारे भी।

FAO — डिज़ाइन सिंचाई दक्षता
90%
ड्रिप सिंचाई में पंप किए गए पानी का क़रीब 90% हिस्सा जड़ तक पहुँचता है, जबकि फरो सिंचाई में यह आमतौर पर 40-60% ही रहता है।
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फरो सिंचाई की तीन कमज़ोरियाँ

फरो सिंचाई से ही भारत में तमाम इलाक़ों में आलू की पैदावार बढ़ी है, ख़ासकर ट्यूबवेल और नहर नेटवर्क के फैलने के साथ। पर इसकी तीन मुख्य सीमाएँ हैं: पानी का बड़ा हिस्सा जड़ क्षेत्र से नीचे रिसकर बर्बाद हो जाता है (डीप परकोलेशन); घुला हुआ नाइट्रोजन भी इसी पानी के साथ नीचे बह जाता है; और मेड़ के साथ बहता पानी हमेशा कुछ मिट्टी भी साथ बहा ले जाता है। एक फ़ायदा भी है — यही रिसाव जड़ क्षेत्र से नमक भी बाहर निकाल देता है, इसलिए फरो से सींचे खेतों में नमक जमा होने की दिक़्क़त कम आती है।

ड्रिप सिंचाई कैसे काम करती है

ड्रिप सिस्टम में मेड़ के साथ बिछी छिद्रित पाइप से क़रीब 2.5 बार के हल्के दबाव पर पानी टपकाया जाता है — यह स्प्रिंकलर या पिवट सिस्टम से कम दबाव है, इसलिए पंपिंग की बिजली लागत भी कम रहती है। रेतीली मिट्टी में ड्रिपर की दूरी क़रीब 30 सेंटीमीटर रखी जाती है, चिकनी मिट्टी में इससे ज़्यादा। सिर्फ़ ड्रिपर वाली जगह ही गीली होती है, इसलिए पूरे खेत में न बहाव होता है, न कटाव, न ही ज़्यादा वाष्पीकरण — और सूखी जगह पर खरपतवार भी कम उगते हैं।

इसी पाइप से खाद घोलकर देना — यानी फर्टिगेशन — इस तकनीक का दूसरा बड़ा फ़ायदा है। खाद ठीक उस समय और उतनी ही मात्रा में जड़ तक पहुँचती है जितनी फ़सल को चाहिए। यही वजह है कि भारतीय ट्रायलों में ड्रिप सिंचाई से खाद-उपयोग दक्षता भी फरो के मुक़ाबले बेहतर मिली है — नीचे दिए ICAR ट्रायल में ड्रिप से 67 किलो और फरो से सिर्फ़ 48 किलो पैदावार प्रति किलो खाद मिली।

ICAR ट्रायल में पैदावार का सबूत

इंडियन जर्नल ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ (2009) में छपे एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र के ट्रायल में फरो, ड्रिप और माइक्रो-स्प्रिंकलर सिंचाई की सीधी तुलना की गई:

सिंचाई तरीक़ापैदावार (टन/हेक्टेयर)खाद-उपयोग दक्षता
फरो (पारंपरिक)22.648 किलो/किलो खाद
ड्रिप29.8367 किलो/किलो खाद
माइक्रो-स्प्रिंकलर31.6071 किलो/किलो खाद

दोनों माइक्रो-सिंचाई तरीक़े फरो से साफ़ आगे रहे। यह सिर्फ़ एक अर्ध-शुष्क इलाक़े का नतीजा है — मिट्टी, जलवायु और सिंचाई के शेड्यूल के हिसाब से आंकड़े बदल सकते हैं, इसलिए इसे दिशा-सूचक मानें, हर खेत की गारंटी नहीं।

लागत और PMKSY सब्सिडी

प्रति एकड़ लागत के हिसाब से ड्रिप सबसे महँगी सिंचाई तकनीक है — पंप, फ़िल्टर, पाइप और मज़दूरी सब जुड़कर छोटे किसानों के लिए यही सबसे बड़ी रुकावट बनती है। सरकार की पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना (PMKSY का हिस्सा) इसी लागत को कम करने के लिए बनी है।

55%
छोटे-सीमांत किसानों को केंद्रीय सहायता
45%
बाक़ी किसानों को केंद्रीय सहायता
2.5 बार
ड्रिप सिस्टम का सामान्य दबाव

पंजाब जैसे इलाक़ों के लिए क्यों ज़रूरी

भारत में देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य पंजाब भूजल संकट से सबसे ज़्यादा जूझ रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के मुताबिक़ पंजाब की आँकी गई 150 भूजल इकाइयों में से 114 (76.47%) "अति-दोहित" श्रेणी में हैं, और राज्य का भूजल निकासी स्तर 156.36% तक पहुँच चुका है — यानी हर साल ज़मीन में वापस जाने वाले पानी से कहीं ज़्यादा पानी निकाला जा रहा है। ऐसे इलाक़ों में ड्रिप सिंचाई सिर्फ़ दक्षता की बात नहीं रह जाती, बल्कि लगभग ज़रूरी क़दम बन जाती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ड्रिप सिंचाई क्या है और यह आलू की खेती में कैसे काम करती है?
ड्रिप सिंचाई में मेड़ के साथ बिछी छिद्रित पाइप से क़रीब 2.5 बार के हल्के दबाव पर पानी सीधे जड़ क्षेत्र में धीरे-धीरे टपकाया जाता है। रेतीली मिट्टी में ड्रिपर आमतौर पर क़रीब 30 सेंटीमीटर की दूरी पर लगते हैं। इससे फरो सिंचाई की तुलना में बहाव, कटाव और वाष्पीकरण से होने वाला नुक़सान बहुत कम हो जाता है।
ड्रिप सिंचाई से फरो सिंचाई के मुक़ाबले कितना पानी बचता है?
FAO के मुताबिक़ ड्रिप सिंचाई की डिज़ाइन दक्षता क़रीब 90% होती है, जबकि फरो सिंचाई की आमतौर पर 40-60% के बीच रहती है — यानी पंप किए गए पानी का बहुत बड़ा हिस्सा असल में फ़सल की जड़ तक पहुँचता है। अगर ड्रिपर बंद हो जाएँ या सिस्टम की देखभाल ठीक न हो, तो असल दक्षता इस डिज़ाइन आँकड़े से कम भी रह सकती है।
क्या भारत में आलू किसानों को ड्रिप सिंचाई पर सरकारी सब्सिडी मिलती है?
हाँ। PMKSY की पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना के तहत केंद्र सरकार छोटे-सीमांत किसानों को 55% और बाक़ी किसानों को 45% सहायता देती है, और आलू सहित चौड़ी दूरी वाली सब्ज़ी फ़सलें इसमें शामिल हैं। कई राज्य सरकारें इसके ऊपर अतिरिक्त सब्सिडी भी देती हैं।
ड्रिप सिंचाई से आलू की पैदावार में कितना फ़ायदा होता है?
भारतीय कृषि अनुसंधान पत्रिका (Indian Journal of Agricultural Sciences, 2009) में छपे एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र के ट्रायल में फरो सिंचाई से 22.6 टन/हेक्टेयर और ड्रिप सिंचाई से 29.83 टन/हेक्टेयर पैदावार मिली — यानी क़रीब 32% ज़्यादा। मिट्टी, जलवायु और सिस्टम के रखरखाव के हिसाब से नतीजे अलग-अलग हो सकते हैं।
लेखक के बारे में
देवेंद्र कुमार झा
देवेंद्र कुमार झा
आलू उद्योग इंटेलिजेंस विशेषज्ञ

इंडियन पोटैटो के संस्थापक एवं निदेशक — आलू पर भरोसेमंद जानकारी (पोटैटो इंटेलिजेंस) और आलू से जुड़े हितधारकों का समुदाय खड़ा करने को समर्पित मंच। कृषि अभियांत्रिकी में बी.टेक; आलू के क्षेत्र के जानकार और इसके प्रति गहरा लगाव रखने वाले।

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