इंजी. सुखविंदर सिंह चहल कौन हैं? आलू खोदने की मशीन और एरोपोनिक बीज के पीछे CPRI के इंजीनियर
ICAR-CPRI जालंधर के फ़ार्म मशीनरी वैज्ञानिक इंजी. सुखविंदर सिंह चहल की आलू खुदाई मशीन ने मज़दूरी 37% और आलू का नुक़सान 72% घटाया। एरोपोनिक बीज पर भी काम किया है।

सीधी बात
इंजी. सुखविंदर सिंह चहल पंजाब के ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र, जालंधर में फ़ार्म मशीनरी और पावर के वैज्ञानिक (सलेक्शन ग्रेड) हैं। उन्होंने ट्रैक्टर वाली आलू खुदाई मशीन बनाई, जिसने हाथ से खुदाई के मुक़ाबले मज़दूरी 37% और आलू का नुक़सान 72% घटाया। वे एरोपोनिक बीज आलू पर काम कर चुके हैं और 2025-26 के लिए इंडियन पोटैटो एसोसिएशन के रीजनल काउंसिलर हैं। 21–23 नवंबर 2026 की इंडियनपोटैटो ऑनलाइन ट्रेनिंग के पहले वक्ता भी वही हैं।
- नाम
- इंजी. सुखविंदर सिंह चहल
- पद
- वैज्ञानिक (SG), कृषि इंजीनियरिंग (फ़ार्म मशीनरी और पावर)
- कहाँ
- ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र, जालंधर, पंजाब
- पहले
- CPRI कैंपस, मोदीपुरम, मेरठ (यूपी)
- पढ़ाई
- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (उनके LinkedIn प्रोफ़ाइल के मुताबिक़)
- एसोसिएशन
- इंडियन पोटैटो एसोसिएशन, रीजनल काउंसिलर, रीजन III (2025–26)
CPRI में वे क्या काम करते हैं?
आलू की ज़्यादातर रिसर्च किस्मों, बीज की सेहत और बीमारियों पर होती है। इंजी. चहल काम के दूसरे हिस्से पर लगे हैं: वे मशीनें और सिस्टम जो अच्छे बीज को खुदे हुए, स्टोर होने लायक़ आलू तक पहुँचाते हैं। ICAR-CPRI में उनका विषय फ़ार्म मशीनरी और पावर है, और वे संस्थान के जालंधर केंद्र में हैं, जो पंजाब की बीज आलू बेल्ट के बीच में है।
उनका छपा हुआ काम तीन हिस्सों में है:
- खुदाई की मशीन: भारतीय खेतों के लिए ट्रैक्टर से चलने वाली दो लाइन की मल्टीपर्पज़ आलू खुदाई मशीन।
- बीज आलू: एरोपोनिक सिस्टम, जिसमें टिश्यू कल्चर के पौधों से बीमारी-मुक्त मिनीट्यूबर बनते हैं।
- कम ख़र्च में खेती: CPRI जालंधर की टीम का बनाया छत पर सब्ज़ी उगाने का तरीक़ा।
मल्टीपर्पज़ आलू खुदाई मशीन
मोदीपुरम (मेरठ) के CPRI कैंपस में रहते हुए उन्होंने ट्रैक्टर से चलने वाली दो लाइन की मल्टीपर्पज़ आलू खुदाई मशीन डिज़ाइन की, बनाई और खेत में परखी। इसकी रिपोर्ट पोटैटो जर्नल (खंड 33) में छपी। मशीन उन्हीं लाइन दूरियों के लिए बनी जो भारतीय किसान असल में रखते हैं: 610 मिमी और 686 मिमी (27 इंच), बस मेड़ खोलने वाले हिस्से को थोड़ा एडजस्ट करना पड़ता है।
नतीजे पोटैटो जर्नल में छपी मशीन की रिपोर्ट के मुताबिक़।
अगेती फ़सल बेचने वाले किसान के लिए मज़दूरी और आलू की चोट, दोनों एक साथ कम होना दोगुना फ़ायदा है: सीज़न के सबसे व्यस्त समय में कम मज़दूर चाहिए, और कम चोट वाले आलू स्टोर में जाते हैं, जहाँ चोट आगे सड़न बनती है।
एरोपोनिक बीज आलू पर काम
एरोपोनिक्स में आलू के पौधे की जड़ें एक बंद चैंबर में हवा में लटकी रहती हैं और पोषक घोल की फुहार से खाना लेती हैं। हर पौधा कई तुड़ाई में ढेर सारे छोटे, बीमारी-मुक्त मिनीट्यूबर देता है। इसीलिए ICAR-CPRI और प्राइवेट बीज कंपनियाँ साफ़ बीज मिट्टी के मुक़ाबले तेज़ी से बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं।
इंजी. चहल, जालंधर में फ़ार्म मशीनरी और पावर के वैज्ञानिक के तौर पर, 2015 में इंडियन जर्नल ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ में छपी उस रिसर्च के सह-लेखक हैं, जिसमें 2013 और 2014 में ICAR के शिलांग केंद्र पर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों के लिए एरोपोनिक्स परखा गया।
तीनों किस्मों के पौधे रोपाई के बाद 90% से ज़्यादा बचे और 4–5 दिन में जड़ें निकल आईं। 2016 में पोटैटो जर्नल के एक नोट के भी वे सह-लेखक हैं, जिसमें देखा गया कि टिश्यू कल्चर के पौधों को एरोपोनिक यूनिट में डालने से पहले सख़्त (हार्डनिंग) करने से बीज उत्पादन पर क्या असर पड़ता है।
एरोपोनिक्स और टिश्यू कल्चर हमारी टीम के साथ सीखें
इंजी. सुखविंदर सिंह चहल इंडियनपोटैटो की तीन दिन की लाइव ऑनलाइन ट्रेनिंग टिश्यू कल्चर से नेक्स्ट-जेनरेशन आलू उत्पादन तक (21, 22 और 23 नवंबर 2026) के पहले वक्ता हैं। तीसरे दिन एरोपोनिक्स, हाइड्रोपोनिक्स और प्रोटेक्टेड खेती सिखाई जाएगी। सर्टिफ़िकेट भी मिलेगा।
प्रोग्राम देखें और रजिस्टर करेंCPRI जालंधर का छत पर खेती का तरीक़ा
फ़रवरी 2021 में CPRI जालंधर ने छत पर सब्ज़ी उगाने का एक तरीक़ा लॉन्च किया, जिसे संस्थान की पाँच सदस्यों वाली एग्री-बिज़नेस इनक्यूबेटर टीम ने बनाया था। इंजी. चहल इस टीम के दो इंजीनियरों में से एक थे। इसमें धान की पराली की परत पर मज़बूत बुनी हुई वीड-मैट वाली क्यारियाँ बनती हैं, जो फ़्लैट और छोटे घरों में फ़िट हो जाती हैं। संस्थान ने यह तकनीक ₹5,000 की लाइसेंस फ़ीस पर प्राइवेट सर्विस देने वालों को दी, जिनकी संख्या उस समय पंजाब और दूसरे राज्यों में करीब 15 थी।
उन्होंने तब बताया था कि कोविड के दिनों में लोग घर पर बिना केमिकल सब्ज़ी उगाना चाहते थे, इसलिए संस्थान ने आलू से आगे इस काम के लिए ख़ास अनुमति ली।
करियर एक नज़र में
आलू की खेती में इंजीनियर क्यों ज़रूरी हैं
भारत में आलू की बुवाई, मिट्टी चढ़ाना, खुदाई, ग्रेडिंग और स्टोरेज कुछ ही हफ़्तों में होता है, और खुदाई के समय मज़दूर हर साल कम और महँगे होते जा रहे हैं। भारतीय लाइन दूरी और छोटे ट्रैक्टरों के हिसाब से बनी मशीनें, और एरोपोनिक्स जैसे तरीक़े जो किसान तक साफ़ बीज जल्दी पहुँचाते हैं, यहीं से पैदावार और कमाई में अगली बढ़त आएगी। ICAR-CPRI में इंजी. चहल यही काम करते आ रहे हैं।
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स्रोत: इंडियन पोटैटो इंटेलिजेंस


