बिना मिट्टी, हवा में उगता आलू का बीज — पटियाला की यूनिएग्री
पटियाला में अश्वनी सिंगला की यूनिएग्री बायोसाइंस हवा में आलू का बीज उगाती है — साल में 1 करोड़ मिनी ट्यूबर, ICAR-CPRI का तकनीक लाइसेंस, DBT प्रमाणित लैब।

आलू की पैदावार खेत में तय नहीं होती। वह उस कंद में तय हो चुकी होती है जो बोया गया। अश्वनी सिंगला ने आलू चिप्स की एक मल्टीनेशनल कंपनी में करियर बिताने के बाद यही कमी पाटने का काम चुना — और पटियाला में यूनिएग्री बायोसाइंस प्राइवेट लिमिटेड खड़ी की, जहाँ आलू का बीज मिट्टी में नहीं, हवा में बनता है।
वह कमी जिसे पाटने वे निकले
सिंगला के मुताबिक़ देश में अच्छा बीज ज़रूरत का सिर्फ़ 20% के आसपास है, और यही आँकड़ा पूरी इकाई के होने की वजह है। किसान की कमाई की हद खेत में कुछ होने से बहुत पहले, बीज कैसा है उसी पर बँध जाती है।
जड़ें हवा में क्यों लटकती हैं
एरोपोनिक्स में माध्यम पूरी तरह हट जाता है। पौधा एक कॉलर में टिका रहता है, तना ऊपर और जड़ें नीचे बंद अँधेरे चैंबर में लटकी हुईं, जिन पर थोड़ी-थोड़ी देर में खाद-पानी का छिड़काव होता रहता है। कंद उन्हीं लटकी जड़ों पर बनते हैं और आकार में आते ही हाथ से तोड़ लिए जाते हैं — पौधा उखाड़े बिना।
इसका फ़ायदा दो तरफ़ा है। एक पौधे पर 60 से 70 कंद बनते हैं, तुड़ाई रोपाई के क़रीब 45वें दिन शुरू होकर आगे 60 से 70 दिन चलती है — यानी एक ही खड़ी फ़सल से लगातार चलने वाली लंबी तुड़ाई, एक बार की खुदाई नहीं। और मिट्टी नहीं है, इसलिए मिट्टी से लगने वाले वे रोग भी नहीं हैं जो बीज को हर पीढ़ी में कमज़ोर करते जाते हैं।
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WhatsApp कीजिएएक ही चीज़ बनाने के दो रास्ते, और उन पर नज़र रखती लैब
चैंबर वह हिस्सा है जो तस्वीरों में अच्छा लगता है, पर पटियाला में माल बनाने की दो लाइनें हैं। इनके साथ-साथ यूनिएग्री कोकोपीट नेट-हाउस भी चलाती है — फुहार के बजाय माध्यम में, पर मिट्टी के बिना, जिनकी क्षमता सालाना क़रीब 50 लाख मिनी ट्यूबर की है। बात वही है, रास्ता सस्ता: मिट्टी हटाइए, मिट्टी के रोग भी साथ चले जाएँगे। एरोपोनिक्स में बढ़त ज़्यादा मिलती है और काबू भी ज़्यादा रहता है; कोकोपीट नमी रोक लेता है, इसलिए पंप बंद होना वहाँ मुसीबत है, तबाही नहीं — और पूँजी का ख़र्च एक हिस्सा भर है। दोनों चलाना सोच-समझकर किया गया बचाव है, और ज़्यादातर इकाइयाँ इनमें से एक भी नहीं चलातीं।
दोनों के नीचे वह चीज़ बैठी है जो असल में तय करती है कि माल ख़रीदने लायक़ है या नहीं — टिश्यू कल्चर लैब, जिसमें वायरस इंडेक्सिंग और PCR जाँच अपने ही यहाँ होती है। वायरस आँख से नहीं दिखता, और जब तक खेत में दिखे तब तक बरसों गुज़र चुके होते हैं। नमूने बाहर भेजकर रिपोर्ट का इंतज़ार करने के बजाय अपनी लैब में जाँच होने का मतलब है कि बीमार पौधों की लाइन हज़ारों पौधों में फैलने से पहले पकड़ में आ जाए।
और उत्पादन पूरी शुरुआती कड़ी पर फैला है — G0 मिनी ट्यूबर से G1 और G2 बीज तक, अपने ही स्टॉक से उगाया हुआ। भारत में इस तरह सब कुछ एक ही जगह होना आम बात नहीं है, जहाँ पीढ़ियाँ आम तौर पर अलग-अलग हाथों में बँटी रहती हैं और हर बार हाथ बदलने पर हिसाब कमज़ोर पड़ता जाता है कि माल आया कहाँ से।
काग़ज़, जो ख़रीदार सबसे पहले देखता है
| मान्यता | स्थिति |
|---|---|
| DBT, NCS-TCP | प्रमाणित — टिश्यू कल्चर पौधों की राष्ट्रीय सर्टिफ़िकेट प्रणाली |
| बागवानी विभाग, पंजाब | टिश्यू कल्चर सुविधा का डिज़ाइन स्वीकृत एवं निरीक्षित; एरोपोनिक सुविधा का अलग लाइसेंस |
| ICAR-CPRI | एरोपोनिक तकनीक और इन-विट्रो एक्लाइमेटाइज़ेशन का तकनीक लाइसेंस समझौता; कुफ़री किस्मों के लिए लिखित जुड़ाव |
| ISO 9001:2015 | SGS द्वारा प्रमाणित |
| GLOBALG.A.P. | प्रक्रिया जारी |
इनमें सबसे भारी पंक्ति तीसरी है। ICAR-CPRI का तकनीक लाइसेंस होने का मतलब है कि यह किसी की निजी कोशिश नहीं, देश के आलू अनुसंधान संस्थान की तकनीक उनकी इजाज़त से चलाई जा रही है — और कुफ़री किस्मों पर टेबल तथा प्रसंस्करण, दोनों के लिए समझौते मौजूद हैं।
यह काम इतने कम लोग क्यों करते हैं
एरोपोनिक मिनी ट्यूबर उत्पादन कोई रहस्य नहीं है। प्रोटोकॉल बरसों से प्रकाशित हैं और भारत के सरकारी संस्थानों ने उन्हें परखा भी है। फिर भी इतने बड़े पैमाने पर, हर सीज़न यह चलाने वाली निजी कंपनियाँ बहुत कम हैं। कमी जानकारी की नहीं है — कमी उस सब की है जो एक दशक तक ठीक चलते रहना चाहिए।
- सफ़ाई में आधे नंबर नहीं मिलते। टिश्यू कल्चर का काम या तो पूरा साफ़ रहता है, या ख़त्म। एक बैच में गंदगी आ गई तो सिर्फ़ वह बैच नहीं जाता, उससे बनने वाली पूरी पीढ़ी चली जाती है।
- चैंबर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। हवा में लटकी जड़ों के पास नमी रोकने को मिट्टी नहीं होती। रात में बंद हुआ पंप छोटी बात नहीं है; नुक़सान घंटों में शुरू हो जाता है।
- पैसा सालों पहले लगता है, लौटता बाद में है। लैब, ग्रीनहाउस, चैंबर, बिजली का बैकअप और सिखाए हुए लोग पहले चुकाने पड़ते हैं, जबकि बेचने लायक़ पहली पीढ़ी कई सीज़न बाद आती है।
- आपका काम आगे किसी को दिखता नहीं। तीन पीढ़ी बाद तैयार बीज ख़रीदने वाले किसान को पता ही नहीं चलता कि वह किस चैंबर से शुरू हुआ था।
असल योगदान
सिंगला प्रसंस्करण उद्योग से आए हैं, किसी रिसर्च संस्थान से नहीं — और यही बात ग़ौर करने लायक़ है। उन्होंने ख़रीदार बनकर देखा था कि ख़राब बीज फ़सल के साथ और उसे उगाने वालों के साथ क्या करता है। फिर जाकर उन्होंने कड़ी का वही हिस्सा बनाया जो इसे ठीक करता है — वह हिस्सा जिसमें वापसी सबसे देर से आती है और वाहवाही सबसे कम मिलती है।
पटियाला से निकलने वाला हर मिनी ट्यूबर साफ़ स्टॉक की एक ऐसी पीढ़ी है जो पहले भारत के पास नहीं थी। और जो किसान आगे चलकर उसकी संतानें बोएँगे, उन्हें कभी पता नहीं चलेगा कि शुरुआत किसके चैंबर में हुई थी।
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अपना ज़िला, रक़बा और कौन-सी श्रेणी का बीज चाहिए, यह भेजिए। हम बताएँगे कि इस सीज़न में कौन-सा रास्ता असल में खुला है — ICAR-CPRI के क्षेत्रीय केंद्र, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, और लाइसेंसधारी उत्पादक।



