एक हेक्टेयर आलू उगाने में कितना ख़र्च आता है
दो सौ किसानों का पूरा हिसाब जोड़ा गया। एक हेक्टेयर आलू की लागत ₹3,08,051 और आमदनी ₹4,67,705 — और इसमें आधे से ज़्यादा पैसा सिर्फ़ दो चीज़ों पर गया: बीज और मज़दूरी।

दो सौ आलू किसानों का ख़र्च एक-एक मद जोड़कर एक पूरे सीज़न के लिए गिना गया। जवाब निकला ₹3,08,051 प्रति हेक्टेयर — और उसमें से क़रीब तीन-पाँचवाँ हिस्सा सिर्फ़ दो चीज़ों पर गया। पूरा बिल यहाँ है, उससे क्या लौटा, और वह पैदावार जिसके नीचे आप घाटे में हैं।
पूरा बिल, प्रति हेक्टेयर
| मद | हिस्सा | रुपये |
|---|---|---|
| बीज | 29% | 89,335 |
| मानव श्रम | 27% | 83,174 |
| बाक़ी सब — गोबर खाद, उर्वरक, दवा, मशीन, सिंचाई | 33% | 1,01,657 |
| कुल परिवर्तनीय लागत | 89% | 2,74,165 |
| स्थिर लागत — किराया, मूल्यह्रास, पूँजी पर ब्याज | 11% | 33,886 |
| कुल लागत | 3,08,051 | |
| सकल आमदनी | 4,67,705 | |
| बचा | 1,59,654 |
बीज और मज़दूरी के रुपये बताए गए प्रतिशत हिस्सों से निकाले गए हैं; कुल और प्रतिशत जैसे के तैसे हैं।
यही इस पूरे बजट की सबसे काम की बात है, क्योंकि इसी से पता चलता है कि लागत घटाने की गुंजाइश कहाँ है। उर्वरक, दवा और सिंचाई — जिन पर किसान सबसे ज़्यादा बहस करते हैं — मिलकर छोटा आधा हैं। प्रति क्विंटल लागत हिलानी है तो बीज दर और मज़दूरी पर हिलेगी, वरना ज़्यादा नहीं हिलेगी।
बीज इतना महँगा क्यों? ये खेत हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में हैं, जो रोगमुक्त गुणवत्ता वाले बीज आलू के लिए जाना जाता है। बीज उगाने वाले इलाक़े खाने वाली फ़सल के इलाक़ों से बीज पर ज़्यादा ख़र्च करते हैं, क्योंकि माल प्रमाणित होना चाहिए। मैदान में साधारण बीज ख़रीदने वाले किसान का बीज-हिस्सा कम बैठेगा — 29% वाला आँकड़ा सीधे उठाकर मत लगाइए।
प्रति क्विंटल — जिस पर बेचने का फ़ैसला होता है
प्रति हेक्टेयर वाला आँकड़ा सब बोलते हैं। प्रति क्विंटल वाला तय करता है कि आप बेचेंगे या नहीं।
| प्रति क्विंटल | छोटे खेत | बड़े खेत |
|---|---|---|
| उत्पादन लागत | ₹1,270 | ₹1,195 |
| जिसमें परिवर्तनीय | ₹1,117 | ₹1,074 |
| मिला भाव | ₹1,860 | ₹1,880 |
| मार्जिन | ₹590 | ₹685 |
| ब्रेक-ईवन, क्विं./हे. | 50.72 | 38.02 |
बड़ा खेत दो तरफ़ से जीतता है। वह हर क्विंटल ₹75 सस्ता पैदा करता है और ₹20 महँगा बेचता है, इसलिए उसका मार्जिन ₹685 बनाम ₹590 — उसी ज़िले की उसी फ़सल पर क़रीब 16% बेहतर। यही पैमाने का काम है: स्थिर लागत ज़्यादा माल पर बँट जाती है, इनपुट थोक में आते हैं, और मात्रा इतनी होती है कि ख़रीदार बेहतर भाव देने लायक़ समझे।
प्रति हेक्टेयर लागत को प्रति क्विंटल लागत से भाग दीजिए तो वह पैदावार निकलती है जो दोनों समूह हासिल कर रहे होंगे। उसी ज़िले के किसानों के एक अलग सर्वे में उत्पादकता छोटे खेतों पर 246.43 और बड़े खेतों पर 253.75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मापी गई। दो अलग-अलग स्रोतों के आँकड़े चार क्विंटल के भीतर बैठ रहे हैं। बजट आपस में मेल खाता है।
1.52 या 1.88 — दोनों, और फ़र्क़ मायने रखता है
इस फ़सल के लिए दो अलग अनुपात बताए जाते हैं और वे आपस में मेल नहीं खाते। यह समझना ज़रूरी है, क्योंकि इन्हीं दोनों के बीच किसान और अर्थशास्त्री की बहस होती है।
ख़ुद भाग देकर देखिए: ₹4,67,705 ÷ ₹3,08,051 = 1.52। सकल आमदनी को पूरी लागत से भाग देने पर यही आता है, और यह बड़े खेतों के बताए गए आउटपुट-इनपुट अनुपात से बिल्कुल मेल खाता है।
बताया गया लाभ-लागत अनुपात 1.88 इसलिए बड़ा है कि वह नीचे वाले लागत आधार पर नापा गया है। लागत A नक़द सामग्री ख़र्च है, लागत B में स्थिर पूँजी पर ब्याज जुड़ता है, लागत C में परिवार के श्रम का मूल्य, और लागत D में प्रबंधन का हिस्सा। उसी आमदनी को सीढ़ी में नीचे वाली लागत से भाग देंगे तो अनुपात ऊपर चढ़ जाएगा।
1.52 बताता है कि खेत ने सब कुछ मिलाकर क्या लौटाया। 1.88 बताता है कि घर को कैसा लगा। — एक ही फ़सल, दो अलग सवाल
कोई भी आपको किसी फ़सल का लाभ-लागत अनुपात बताए तो पहला सवाल यही होना चाहिए: कौन सी लागत? बिना लागत आधार के बताया गया अनुपात इस्तेमाल के लायक़ नहीं है।
इस बजट को अपना कैसे बनाएँ
- अपने बीज के बिल से शुरू कीजिए, कुल से नहीं। अगर बीज आपके ख़र्च का क़रीब 29% है, तो बाक़ी बजट भी आपके खेत पर ठीक-ठाक बैठेगा।
- बोने से पहले अपना ब्रेक-ईवन जान लीजिए। इन खेतों पर 38 से 51 क्विंटल प्रति हेक्टेयर — जबकि असल पैदावार 240 से ऊपर थी। यही गुंजाइश है, और ख़राब साल में यह कितनी चौड़ी है, जानना काम आता है।
- भाव नहीं, प्रति क्विंटल मार्जिन देखिए। ऊँची लागत पर ऊँचा भाव, कम लागत पर कम भाव से बुरा पड़ सकता है।
- परिवार के श्रम की क़ीमत भी जोड़िए। न जोड़ने से वह मुफ़्त नहीं हो जाता, बस दिखना बंद हो जाता है।
और वह ज़मीन जिस पर ये किसान खड़े हैं: औसत जोत 1.76 हेक्टेयर, जिसका 74% सिंचित। कुल घरेलू आमदनी में खेती का हिस्सा 45.2%, जिसमें आलू अकेले क़रीब 8%, और ग़ैर-कृषि आमदनी 26.5%। कांगड़ा में आलू साल का एक अहम हिस्सा है। किसी की पूरी रोज़ी-रोटी नहीं।
आगे पढ़ें: 1 बीघा में आलू का बीज और लागत, आलू से पहले ढैंचा, और आज का आलू भाव।


