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आलू प्लांटर की कीमत: GST 5%, सब्सिडी की सीमा और असली लागत

आलू प्लांटर ₹1.25 लाख से ₹7.5 लाख में मिलता है, ऊपर 5% GST और नीचे रुपये में बँधी सब्सिडी। वही ईशर 2-कतार मशीन ₹1,14,000 से ₹1,69,000 तक पड़ती है — राज्य के हिसाब से।

इंडियन पोटैटो डेस्क · 08 अगस्त 2026 · 9 मिनट
आलू प्लांटर की कीमत — ट्रैक्टर से जुड़ी 4-कतार ऑटोमैटिक आलू प्लांटर मशीन, खाद हॉपर और मेड़ बनाने वाले हिस्सों के साथ
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भारत में आलू प्लांटर का भाव ₹1.25 लाख से ₹7.5 लाख के बीच लगता है। उस पर 5% GST जुड़ता है — 22 सितंबर 2025 से, पहले 12% था — और उसमें से सब्सिडी घटती है, जो रुपये में बँधी है, प्रतिशत में नहीं। यही सीमा असली नंबर तय करती है। ₹1.89 लाख की मशीन पर ₹75,000 की केंद्रीय सीमा 40% की छूट बनती है; ₹5.78 लाख की मशीन पर वही ₹75,000 सिर्फ़ 13%। सब्सिडी दाम के साथ नहीं बढ़ती, इसलिए सस्ती और महँगी मशीन के बीच असली फ़ासला लिस्ट प्राइस से भी ज़्यादा है।

5%
कृषि यंत्रों पर GST — 22 सितंबर 2025 से
₹75,000
अकेले किसान के लिए सबसे ऊँची सीमा
₹1.14 लाख
सबसे कम व्यावहारिक असली लागत

GST 12% से 5% हुआ — और ज़्यादातर रेट लिस्ट अब भी पुरानी हैं

22 सितंबर 2025 से कृषि यंत्रों पर GST 12% से घटकर एकसमान 5% हो गया। आलू प्लांटर ठीक इसी बदलाव के अंदर आता है — यह मिट्टी तैयार करने और बुवाई वाले यंत्रों की श्रेणी में है, सीड ड्रिल, रोटावेटर और पावर टिलर के साथ।

ऊपर के दाम पर बचत छोटी नहीं है। ₹5.5 लाख की मशीन पर टैक्स ₹66,000 से घटकर ₹27,500 रह गया — उसी मशीन पर बिल में सीधे ₹38,500 कम।

सिर्फ़ GST घटने से बचत · ₹5.5 लाख की मशीन पर
₹38,500
डीलर अब भी 12% वाली टैक्स लाइन दिखा रहा है तो वह कोटेशन सितंबर 2025 से पुराना है — दोबारा बनवाएँ।

इसके दो सीधे मतलब हैं। पहला, जिस भी रेट लिस्ट, पोर्टल के आँकड़े या पुराने कोटेशन में 12% लिखा है वह अब चलता नहीं, और फ़र्क़ असली पैसे का है। दूसरा, दो लिखित कोटेशन मिलाने से पहले देख लें कि दोनों में टैक्स की दर एक ही है — वरना सस्ता लगने वाला डीलर सस्ता है ही नहीं।

असली हिसाब: मशीन खाते से कितने में निकलती है

तीन नंबर तय करते हैं कि जेब से कितना जाएगा — कोटेशन का दाम, टैक्स, और आप पर लागू होने वाली सब्सिडी की सीमा। नीचे वही हिसाब एक शुरुआती और एक ऊपरी स्तर की मशीन पर, 35 BHP से ऊपर के ट्रैक्टर वाले केंद्रीय लागत नॉर्म के साथ।

शुरुआती स्तर — ईशर IEW-APP-2R, 2-कतार ऑटोमैटिक

मदरक़म
कोटेशन का दाम — कंपनी का प्रकाशित भाव₹1,80,000
+ GST 5%₹9,000
− सब्सिडी — 50% से ₹94,500 बनते, पर ₹75,000 की सीमा आड़े आ गई₹75,000
= असली लागत — 40% कम₹1,14,000

ऊपरी स्तर — शक्तिमान-ग्रिम SGPP-205, अपने दायरे के निचले सिरे पर

मदरक़म
कोटेशन का दाम — ₹5.5–7.5 लाख के दायरे का निचला सिरा₹5,50,000
+ GST 5%₹27,500
− सब्सिडी — 50% से ₹2,88,750 बनते, पर वही ₹75,000 की सीमा आड़े आ गई₹75,000
= असली लागत — सिर्फ़ 13% कम₹5,02,500

दोनों तालिकाओं में ख़रीदार एक ही है, श्रेणी एक ही है, और सीमा भी एक ही — ₹75,000, 50% की दर पर।

लिस्ट प्राइस पर दोनों मशीनों का फ़ासला ₹3.7 लाख है। टैक्स और सब्सिडी के बाद वही फ़ासला ₹3.89 लाख हो जाता है। सब्सिडी ने अंतर घटाया नहीं, बढ़ा दिया — क्योंकि यह रुपये में बँधी सीमा है, जिसे सस्ती मशीन पूरा खा जाती है और महँगी मशीन छू भी नहीं पाती।

शॉर्टलिस्ट बनाने से पहले समझने लायक़ सबसे काम की बात यही है। "50% सब्सिडी" वाली योजना 50% सिर्फ़ सीमा तक देती है। उसके आगे मशीन का हर रुपया पूरा आपका है।

एक ही मशीन, राज्य बदलते ही अलग दाम

आलू पट्टी के ज़्यादातर राज्यों में सीमा केंद्रीय नॉर्म से नीचे है, इसलिए खेत कहाँ है यह भी दाम तय करता है। नीचे का हिसाब ईशर की 2-कतार मशीन पर है — ₹1,80,000 जमा 5% GST, यानी ₹1,89,000 का बिल।

राज्य / श्रेणीलागू सीमामिली सब्सिडीअसली लागतकितनी कमी
केंद्रीय नॉर्म — 50% श्रेणी₹75,000₹75,000₹1,14,00040%
पश्चिम बंगाल₹70,000₹70,000₹1,19,00037%
केंद्रीय नॉर्म — 40% श्रेणी₹60,000₹60,000₹1,29,00032%
बिहार — SC/ST/OBC₹50,000₹50,000₹1,39,00026%
बिहार — सामान्य₹40,000₹40,000₹1,49,00021%
हरियाणा — SC, छोटे-सीमांत, महिला₹25,000₹25,000₹1,64,00013%
हरियाणा — सामान्य₹20,000₹20,000₹1,69,00011%

असली लागत = कोटेशन का दाम + 5% GST − (प्रतिशत वाली रक़म और राज्य की सीमा, इनमें से जो कम हो)। कीमतें बाज़ार और मौजूदा ख़रीदारों से जुटाई गई हैं। उत्तर प्रदेश अकेले किसान के लिए आलू प्लांटर सूची में रखता ही नहीं — समूह वाले रास्ते नीचे हैं।

एक ही मशीन, एक ही श्रेणी का किसान · दो अलग राज्य
₹55,000
केंद्रीय नॉर्म वाले राज्य में ₹1,14,000 और हरियाणा में ₹1,69,000 — ₹1.8 लाख की मशीन पर इतना फ़र्क़ सिर्फ़ जगह का है।

उत्तर प्रदेश अपवाद है, और वही सबसे बड़ा बाज़ार है

देश के सबसे बड़े आलू राज्य की अकेले किसान वाली यंत्र बुकिंग सूची में आलू खोदने वाली मशीन है, प्लांटर नहीं। यानी वहाँ अकेला किसान इस मशीन पर सब्सिडी ले ही नहीं सकता। दो रास्ते बचते हैं, दोनों समूह वाले: परियोजना के आधार पर फ़ार्म मशीनरी बैंक 80% पर, या कस्टम हायरिंग सेंटर 40% पर, जिनमें प्लांटर अकेले नहीं बल्कि एक बड़ी यंत्र परियोजना की एक लाइन के तौर पर ख़रीदा जाता है।

जो समूह परियोजना चलाने का दम रखता हो, उसके लिए फ़ार्म मशीनरी बैंक वाला रास्ता इस मशीन पर पूरे देश में मिलने वाली सबसे बड़ी सहायता है — अकेले किसान के 40 या 50% के मुक़ाबले 80%।

एक ही ब्रांड में दो लाख का फ़र्क़ क्यों

ऊपरी स्तर की हर मशीन का दाम दायरे में बताया जाता है, क्योंकि मशीन ऑर्डर पर बनती है, शेल्फ़ से नहीं उठती। नंबर इन चीज़ों से हिलता है:

दो कोटेशन मिलाते वक़्त पहले कॉन्फ़िगरेशन मिलाएँ। बिना खाद यूनिट वाला ₹5.5 लाख का कोटेशन और खाद यूनिट वाला ₹6.5 लाख का कोटेशन एक ही मशीन नहीं हैं, और छोटा नंबर सस्ता सौदा नहीं है।

लिखवाकर लेने लायक़ एक लाइन: मॉडल का पूरा कोड, दी जा रही कतार-दूरी, खाद यूनिट लगी है या नहीं, और खेत में पहुँचाकर चालू करने तक का दाम। ज़ुबानी भाव डेमो से बिल तक पहुँचते-पहुँचते बदल जाता है।

वह शर्त जो पैसे देने के बाद सब्सिडी रोक देती है

योजना के दिशानिर्देश कहते हैं कि सहायता सिर्फ़ उन्हीं यंत्रों पर मिलेगी जिनका परीक्षण फ़ार्म मशीनरी ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट या विभाग के नामित किसी दूसरे संस्थान से हुआ हो। बिना टेस्ट रिपोर्ट वाली मशीन ख़रीद ली तो सब्सिडी आती ही नहीं, डीलर ने चाहे जो कहा हो।

ऑर्डर देने से पहले उसी मॉडल की — ब्रांड की नहीं — टेस्ट रिपोर्ट का हवाला माँग लें। एक ही कंपनी की दो मशीनों में यह अलग हो सकता है, और विभाग इसी हवाले से मिलान करता है।

दूसरी जाँच है राज्य के अपने यंत्र पोर्टल पर कंपनी का पंजीकरण। सब्सिडी का दावा पंजीकृत निर्माता और मॉडल के ख़िलाफ़ चलता है; कंपनी आपके राज्य की सूची में नहीं हुई तो काग़ज़ आख़िरी क़दम पर अटक जाते हैं।

पुरानी मशीन ख़रीदना — और उससे कितना बचता है

पुरानी मशीनों का चलता हुआ बाज़ार है, ख़ासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश में — वही पट्टियाँ जहाँ मशीनें इतनी पहले आईं कि अब आगे बिक रही हैं। पुराना प्लांटर आम तौर पर बराबर की नई मशीन के क़रीब आधे दाम पर हाथ बदलता है।

इसके सामने दो बातें तौलनी हैं। निजी तौर पर पुरानी मशीन ख़रीदने पर सब्सिडी नहीं मिलती, इसलिए मुक़ाबला पूरे दाम की पुरानी मशीन और सब्सिडी के बाद वाली नई मशीन के बीच है। शुरुआती स्तर पर, जहाँ सीमा 40% की छूट दे देती है, नई मशीन पुरानी के क़रीब आ जाती है। ऊपरी स्तर पर, जहाँ सब्सिडी सिर्फ़ 13% है, पुरानी मशीन से असली बचत होती है।

घिसने वाले पुर्ज़े ही देखने लायक़ हैं: कप बेल्ट, कप, चेन और स्प्रॉकेट, वाइब्रेटर, और नाली खोलने वाले फ़रो ओपनर। यही तय करते हैं कि मशीन अब भी सही दूरी पर बीज गिराती है या नहीं, और इन्हें डेमो में परखना खेत में पता चलने से सस्ता पड़ता है।

ख़रीदने का सही वक़्त

रबी देश के क़रीब 90% आलू का सीज़न है और बुवाई सितंबर मध्य से नवंबर तक चलती है। इससे दो बातें निकलती हैं।

भीड़ से पहले ख़रीदें। जो मशीन साल में कुछ ही हफ़्ते बिकती है, डीलर उसका स्टॉक सीमित रखता है, और कॉन्फ़िगरेशन के विकल्प — खाद यूनिट, कोई ख़ास कतार-दूरी, कप सेट — सबसे पहले ख़त्म होते हैं। अगस्त में दिया गया ऑर्डर आपकी माँगी हुई सेटिंग के साथ आता है; अक्टूबर वाला ऑर्डर वही लाता है जो फ़्लोर पर पड़ा है।

सब्सिडी का आवेदन इससे भी पहले डालें। राज्यों की आवेदन खिड़कियाँ अपने कैलेंडर पर खुलती-बंद होती हैं, आपकी बुवाई की तारीख़ से उनका कोई लेना-देना नहीं, और आवेदन ब्लॉक के लक्ष्य से ज़्यादा हुए तो चुनाव लॉटरी से होता है। खिड़की चूकने पर उस साल की सब्सिडी का कुछ हिस्सा नहीं, पूरी सब्सिडी जाती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आलू प्लांटर पर GST कितना लगता है?
5%। मिट्टी तैयार करने और बुवाई वाले कृषि यंत्रों पर GST 22 सितंबर 2025 से 12% से घटकर एकसमान 5% हो गया, और आलू प्लांटर इसी श्रेणी में आता है — सीड ड्रिल, रोटावेटर और पावर टिलर के साथ। ₹5.5 लाख की मशीन पर टैक्स ₹66,000 से घटकर ₹27,500 रह गया, यानी ₹38,500 की बचत। जिस भी कोटेशन में अब भी 12% लिखा है, वह सितंबर 2025 से पुराना है — दोबारा बनवा लें।
आलू प्लांटर पर असल में कितनी सब्सिडी मिलती है?
जितनी सीमा तय है, उससे ज़्यादा नहीं — सब्सिडी रुपये में बँधी है, प्रतिशत में नहीं, और यही सीमा असली फ़ैसला करती है। 35 BHP से ऊपर के ट्रैक्टर वाले ऑटोमैटिक आलू प्लांटर पर केंद्रीय लागत नॉर्म SC/ST, छोटे-सीमांत और महिला किसानों के लिए 50% पर ₹75,000 है और बाक़ी सभी के लिए 40% पर ₹60,000। ₹1.89 लाख के बिल पर ₹75,000 का मतलब 40% छूट है; ₹5.78 लाख के बिल पर वही ₹75,000 सिर्फ़ 13% रह जाता है। राज्यों की सीमाएँ अक्सर इससे भी नीचे हैं — पश्चिम बंगाल ₹70,000, बिहार ₹40,000 से ₹50,000, हरियाणा ₹20,000 से ₹25,000।
GST और सब्सिडी के बाद आलू प्लांटर कितने का पड़ता है?
ईशर की 2-कतार ऑटोमैटिक ₹1,80,000 की है; 5% GST के साथ बिल ₹1,89,000 बनता है और पूरी ₹75,000 की केंद्रीय सीमा मिलने पर मशीन ₹1,14,000 में पड़ती है — 40% कम। शक्तिमान-ग्रिम SGPP-205 अपने ₹5.5–7.5 लाख के दायरे के निचले सिरे पर ₹5,50,000 की है; GST के साथ बिल ₹5,77,500 और उसी ₹75,000 की सीमा के बाद ₹5,02,500 — सिर्फ़ 13% कम। सब्सिडी के बाद दोनों मशीनों का फ़र्क़ घटता नहीं, बढ़ जाता है।
वही मशीन एक राज्य में सस्ती और दूसरे में महँगी क्यों पड़ती है?
क्योंकि राज्यों की सब्सिडी सीमाएँ अलग-अलग हैं और ज़्यादातर केंद्रीय नॉर्म से नीचे हैं। ईशर की वही 2-कतार मशीन, ₹1,89,000 के बिल पर, जहाँ ₹75,000 की केंद्रीय सीमा लागू है वहाँ ₹1,14,000 में पड़ती है, पश्चिम बंगाल में ₹1,19,000, बिहार में SC/ST/OBC किसान के लिए ₹1,39,000 और हरियाणा में सामान्य श्रेणी के किसान के लिए ₹1,69,000 — एक ही मशीन पर ₹55,000 का फ़र्क़।
क्या उत्तर प्रदेश में आलू प्लांटर पर सब्सिडी मिल सकती है?
अकेले किसान को नहीं। देश के सबसे बड़े आलू राज्य की यंत्र बुकिंग सूची में आलू खोदने वाली मशीन है, प्लांटर नहीं — इसलिए अकेला किसान इस पर सब्सिडी नहीं ले सकता। दो रास्ते बचते हैं, दोनों समूह वाले: परियोजना के आधार पर फ़ार्म मशीनरी बैंक 80% पर, या कस्टम हायरिंग सेंटर 40% पर, जिनमें प्लांटर अकेले नहीं बल्कि एक बड़ी यंत्र परियोजना की एक लाइन के तौर पर आता है। 80% वाला फ़ार्म मशीनरी बैंक रास्ता इस मशीन पर पूरे देश में मिलने वाली सबसे बड़ी सहायता है।
आलू प्लांटरकृषि यंत्रसब्सिडीGSTSMAM
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