आलू प्लांटर की कीमत: GST 5%, सब्सिडी की सीमा और असली लागत
आलू प्लांटर ₹1.25 लाख से ₹7.5 लाख में मिलता है, ऊपर 5% GST और नीचे रुपये में बँधी सब्सिडी। वही ईशर 2-कतार मशीन ₹1,14,000 से ₹1,69,000 तक पड़ती है — राज्य के हिसाब से।

भारत में आलू प्लांटर का भाव ₹1.25 लाख से ₹7.5 लाख के बीच लगता है। उस पर 5% GST जुड़ता है — 22 सितंबर 2025 से, पहले 12% था — और उसमें से सब्सिडी घटती है, जो रुपये में बँधी है, प्रतिशत में नहीं। यही सीमा असली नंबर तय करती है। ₹1.89 लाख की मशीन पर ₹75,000 की केंद्रीय सीमा 40% की छूट बनती है; ₹5.78 लाख की मशीन पर वही ₹75,000 सिर्फ़ 13%। सब्सिडी दाम के साथ नहीं बढ़ती, इसलिए सस्ती और महँगी मशीन के बीच असली फ़ासला लिस्ट प्राइस से भी ज़्यादा है।
GST 12% से 5% हुआ — और ज़्यादातर रेट लिस्ट अब भी पुरानी हैं
22 सितंबर 2025 से कृषि यंत्रों पर GST 12% से घटकर एकसमान 5% हो गया। आलू प्लांटर ठीक इसी बदलाव के अंदर आता है — यह मिट्टी तैयार करने और बुवाई वाले यंत्रों की श्रेणी में है, सीड ड्रिल, रोटावेटर और पावर टिलर के साथ।
ऊपर के दाम पर बचत छोटी नहीं है। ₹5.5 लाख की मशीन पर टैक्स ₹66,000 से घटकर ₹27,500 रह गया — उसी मशीन पर बिल में सीधे ₹38,500 कम।
इसके दो सीधे मतलब हैं। पहला, जिस भी रेट लिस्ट, पोर्टल के आँकड़े या पुराने कोटेशन में 12% लिखा है वह अब चलता नहीं, और फ़र्क़ असली पैसे का है। दूसरा, दो लिखित कोटेशन मिलाने से पहले देख लें कि दोनों में टैक्स की दर एक ही है — वरना सस्ता लगने वाला डीलर सस्ता है ही नहीं।
असली हिसाब: मशीन खाते से कितने में निकलती है
तीन नंबर तय करते हैं कि जेब से कितना जाएगा — कोटेशन का दाम, टैक्स, और आप पर लागू होने वाली सब्सिडी की सीमा। नीचे वही हिसाब एक शुरुआती और एक ऊपरी स्तर की मशीन पर, 35 BHP से ऊपर के ट्रैक्टर वाले केंद्रीय लागत नॉर्म के साथ।
शुरुआती स्तर — ईशर IEW-APP-2R, 2-कतार ऑटोमैटिक
| मद | रक़म |
|---|---|
| कोटेशन का दाम — कंपनी का प्रकाशित भाव | ₹1,80,000 |
| + GST 5% | ₹9,000 |
| − सब्सिडी — 50% से ₹94,500 बनते, पर ₹75,000 की सीमा आड़े आ गई | ₹75,000 |
| = असली लागत — 40% कम | ₹1,14,000 |
ऊपरी स्तर — शक्तिमान-ग्रिम SGPP-205, अपने दायरे के निचले सिरे पर
| मद | रक़म |
|---|---|
| कोटेशन का दाम — ₹5.5–7.5 लाख के दायरे का निचला सिरा | ₹5,50,000 |
| + GST 5% | ₹27,500 |
| − सब्सिडी — 50% से ₹2,88,750 बनते, पर वही ₹75,000 की सीमा आड़े आ गई | ₹75,000 |
| = असली लागत — सिर्फ़ 13% कम | ₹5,02,500 |
दोनों तालिकाओं में ख़रीदार एक ही है, श्रेणी एक ही है, और सीमा भी एक ही — ₹75,000, 50% की दर पर।
लिस्ट प्राइस पर दोनों मशीनों का फ़ासला ₹3.7 लाख है। टैक्स और सब्सिडी के बाद वही फ़ासला ₹3.89 लाख हो जाता है। सब्सिडी ने अंतर घटाया नहीं, बढ़ा दिया — क्योंकि यह रुपये में बँधी सीमा है, जिसे सस्ती मशीन पूरा खा जाती है और महँगी मशीन छू भी नहीं पाती।
शॉर्टलिस्ट बनाने से पहले समझने लायक़ सबसे काम की बात यही है। "50% सब्सिडी" वाली योजना 50% सिर्फ़ सीमा तक देती है। उसके आगे मशीन का हर रुपया पूरा आपका है।
एक ही मशीन, राज्य बदलते ही अलग दाम
आलू पट्टी के ज़्यादातर राज्यों में सीमा केंद्रीय नॉर्म से नीचे है, इसलिए खेत कहाँ है यह भी दाम तय करता है। नीचे का हिसाब ईशर की 2-कतार मशीन पर है — ₹1,80,000 जमा 5% GST, यानी ₹1,89,000 का बिल।
| राज्य / श्रेणी | लागू सीमा | मिली सब्सिडी | असली लागत | कितनी कमी |
|---|---|---|---|---|
| केंद्रीय नॉर्म — 50% श्रेणी | ₹75,000 | ₹75,000 | ₹1,14,000 | 40% |
| पश्चिम बंगाल | ₹70,000 | ₹70,000 | ₹1,19,000 | 37% |
| केंद्रीय नॉर्म — 40% श्रेणी | ₹60,000 | ₹60,000 | ₹1,29,000 | 32% |
| बिहार — SC/ST/OBC | ₹50,000 | ₹50,000 | ₹1,39,000 | 26% |
| बिहार — सामान्य | ₹40,000 | ₹40,000 | ₹1,49,000 | 21% |
| हरियाणा — SC, छोटे-सीमांत, महिला | ₹25,000 | ₹25,000 | ₹1,64,000 | 13% |
| हरियाणा — सामान्य | ₹20,000 | ₹20,000 | ₹1,69,000 | 11% |
असली लागत = कोटेशन का दाम + 5% GST − (प्रतिशत वाली रक़म और राज्य की सीमा, इनमें से जो कम हो)। कीमतें बाज़ार और मौजूदा ख़रीदारों से जुटाई गई हैं। उत्तर प्रदेश अकेले किसान के लिए आलू प्लांटर सूची में रखता ही नहीं — समूह वाले रास्ते नीचे हैं।
उत्तर प्रदेश अपवाद है, और वही सबसे बड़ा बाज़ार है
देश के सबसे बड़े आलू राज्य की अकेले किसान वाली यंत्र बुकिंग सूची में आलू खोदने वाली मशीन है, प्लांटर नहीं। यानी वहाँ अकेला किसान इस मशीन पर सब्सिडी ले ही नहीं सकता। दो रास्ते बचते हैं, दोनों समूह वाले: परियोजना के आधार पर फ़ार्म मशीनरी बैंक 80% पर, या कस्टम हायरिंग सेंटर 40% पर, जिनमें प्लांटर अकेले नहीं बल्कि एक बड़ी यंत्र परियोजना की एक लाइन के तौर पर ख़रीदा जाता है।
जो समूह परियोजना चलाने का दम रखता हो, उसके लिए फ़ार्म मशीनरी बैंक वाला रास्ता इस मशीन पर पूरे देश में मिलने वाली सबसे बड़ी सहायता है — अकेले किसान के 40 या 50% के मुक़ाबले 80%।
एक ही ब्रांड में दो लाख का फ़र्क़ क्यों
ऊपरी स्तर की हर मशीन का दाम दायरे में बताया जाता है, क्योंकि मशीन ऑर्डर पर बनती है, शेल्फ़ से नहीं उठती। नंबर इन चीज़ों से हिलता है:
- खाद यूनिट। खाद टैंक और मीटरिंग वाली मशीन सादे प्लांटिंग यूनिट से साफ़ महँगी पड़ती है, और यही विकल्प सबसे ज़्यादा काम का है — खेत का एक पूरा चक्कर बच जाता है।
- मेड़ बनाने वाले हिस्से और कवरिंग डिस्क। मशीन प्लांटिंग यूनिट के पीछे मेड़ बनाती है या नहीं, और वह कितनी घटती-बढ़ती है।
- कतार-दूरी और कप सेट। ज़्यादा चौड़ा एडजस्टमेंट दायरा और अलग-अलग ग्रेड के बीज के लिए अतिरिक्त कप — दोनों दाम बढ़ाते हैं।
- वाइब्रेटर। बेसिक मॉडल में बेल्ट पर मैकेनिकल वाइब्रेटर, ऊँचे स्पेसिफ़िकेशन में इलेक्ट्रॉनिक।
- डिलीवरी और कमीशनिंग। इन्हें अलग लाइन में लिखवाएँ। राजकोट या मेरठ से एक्स-वर्क्स दिया गया भाव, और खेत में पहुँचाकर चालू करके दिया गया भाव, दो अलग नंबर हैं।
दो कोटेशन मिलाते वक़्त पहले कॉन्फ़िगरेशन मिलाएँ। बिना खाद यूनिट वाला ₹5.5 लाख का कोटेशन और खाद यूनिट वाला ₹6.5 लाख का कोटेशन एक ही मशीन नहीं हैं, और छोटा नंबर सस्ता सौदा नहीं है।
लिखवाकर लेने लायक़ एक लाइन: मॉडल का पूरा कोड, दी जा रही कतार-दूरी, खाद यूनिट लगी है या नहीं, और खेत में पहुँचाकर चालू करने तक का दाम। ज़ुबानी भाव डेमो से बिल तक पहुँचते-पहुँचते बदल जाता है।
वह शर्त जो पैसे देने के बाद सब्सिडी रोक देती है
योजना के दिशानिर्देश कहते हैं कि सहायता सिर्फ़ उन्हीं यंत्रों पर मिलेगी जिनका परीक्षण फ़ार्म मशीनरी ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट या विभाग के नामित किसी दूसरे संस्थान से हुआ हो। बिना टेस्ट रिपोर्ट वाली मशीन ख़रीद ली तो सब्सिडी आती ही नहीं, डीलर ने चाहे जो कहा हो।
ऑर्डर देने से पहले उसी मॉडल की — ब्रांड की नहीं — टेस्ट रिपोर्ट का हवाला माँग लें। एक ही कंपनी की दो मशीनों में यह अलग हो सकता है, और विभाग इसी हवाले से मिलान करता है।
दूसरी जाँच है राज्य के अपने यंत्र पोर्टल पर कंपनी का पंजीकरण। सब्सिडी का दावा पंजीकृत निर्माता और मॉडल के ख़िलाफ़ चलता है; कंपनी आपके राज्य की सूची में नहीं हुई तो काग़ज़ आख़िरी क़दम पर अटक जाते हैं।
पुरानी मशीन ख़रीदना — और उससे कितना बचता है
पुरानी मशीनों का चलता हुआ बाज़ार है, ख़ासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश में — वही पट्टियाँ जहाँ मशीनें इतनी पहले आईं कि अब आगे बिक रही हैं। पुराना प्लांटर आम तौर पर बराबर की नई मशीन के क़रीब आधे दाम पर हाथ बदलता है।
इसके सामने दो बातें तौलनी हैं। निजी तौर पर पुरानी मशीन ख़रीदने पर सब्सिडी नहीं मिलती, इसलिए मुक़ाबला पूरे दाम की पुरानी मशीन और सब्सिडी के बाद वाली नई मशीन के बीच है। शुरुआती स्तर पर, जहाँ सीमा 40% की छूट दे देती है, नई मशीन पुरानी के क़रीब आ जाती है। ऊपरी स्तर पर, जहाँ सब्सिडी सिर्फ़ 13% है, पुरानी मशीन से असली बचत होती है।
घिसने वाले पुर्ज़े ही देखने लायक़ हैं: कप बेल्ट, कप, चेन और स्प्रॉकेट, वाइब्रेटर, और नाली खोलने वाले फ़रो ओपनर। यही तय करते हैं कि मशीन अब भी सही दूरी पर बीज गिराती है या नहीं, और इन्हें डेमो में परखना खेत में पता चलने से सस्ता पड़ता है।
ख़रीदने का सही वक़्त
रबी देश के क़रीब 90% आलू का सीज़न है और बुवाई सितंबर मध्य से नवंबर तक चलती है। इससे दो बातें निकलती हैं।
भीड़ से पहले ख़रीदें। जो मशीन साल में कुछ ही हफ़्ते बिकती है, डीलर उसका स्टॉक सीमित रखता है, और कॉन्फ़िगरेशन के विकल्प — खाद यूनिट, कोई ख़ास कतार-दूरी, कप सेट — सबसे पहले ख़त्म होते हैं। अगस्त में दिया गया ऑर्डर आपकी माँगी हुई सेटिंग के साथ आता है; अक्टूबर वाला ऑर्डर वही लाता है जो फ़्लोर पर पड़ा है।
सब्सिडी का आवेदन इससे भी पहले डालें। राज्यों की आवेदन खिड़कियाँ अपने कैलेंडर पर खुलती-बंद होती हैं, आपकी बुवाई की तारीख़ से उनका कोई लेना-देना नहीं, और आवेदन ब्लॉक के लक्ष्य से ज़्यादा हुए तो चुनाव लॉटरी से होता है। खिड़की चूकने पर उस साल की सब्सिडी का कुछ हिस्सा नहीं, पूरी सब्सिडी जाती है।
हर मशीन की कतार-दूरी, ट्रैक्टर HP, हॉपर और प्रतिदिन एकड़ के लिए भारत में मिलने वाली हर आलू प्लांटर मशीन देखें, उत्पादन की बाक़ी रिपोर्टें, और ताज़ा मंडी भाव के लिए आलू भाव।


