धान की भूसी की राख से आलू को फ़ॉस्फ़ोरस मिल सकता है?
चावल मिल से निकलने वाली राख आलू पर फ़ॉस्फ़ोरस के स्रोत के रूप में आज़माई गई। पौधे में फ़ॉस्फ़ोरस 17.8% तक बढ़ा और पानी रोकने पर फ़सल ज़्यादा देर हरी रही — गमलों में, और सबूत वहीं तक है।

भारत में बहुत बड़ी मात्रा में चावल की मिलिंग होती है और भूसी जला दी जाती है। पीछे बचती है एक स्लेटी-काली राख, जो ज़्यादातर कहीं नहीं जाती। दो परीक्षणों में वही राख आलू पर फ़ॉस्फ़ोरस स्रोत के रूप में डाली गई — और उसने पौधे में फ़ॉस्फ़ोरस 17.8% तक बढ़ाया, ज़्यादा जैव-भार बनाया, और पानी रोकने पर फ़सल को ज़्यादा देर हरा रखा।
दो किस्में, दो मात्राएँ
दोनों किस्मों ने एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी, और दोनों को एक जितनी राख भी नहीं चाहिए थी। यही पहला काम का नतीजा है।
| किस्म | राख प्रति गमला | पत्ती-तने में फ़ॉस्फ़ोरस | और क्या बढ़ा |
|---|---|---|---|
| कुफ़री ज्योति | 20 ग्राम | +17.8% | जैव-भार, कंद पैदावार, क्लोरोफ़िल |
| कुफ़री गिरधारी | 40 ग्राम | +14.6% | पत्ती-तने की पैदावार, जड़ भार, क्लोरोफ़िल |
कुफ़री गिरधारी को दोगुनी राख चाहिए थी और फ़ॉस्फ़ोरस का फ़ायदा फिर भी कम मिला। यह किस्म की कमी नहीं है; यह याद दिलाता है कि मिट्टी सुधारक जितना मिट्टी से, उतना ही पौधे से भी जुड़ता है। अगर यह कभी खेत की सिफ़ारिश बनी, तो किस्म के हिसाब से बननी पड़ेगी — और एक ही मात्रा पढ़ने वाले किसान को पूछना चाहिए कि वह किस किस्म की है।
दोनों परीक्षणों में राख डालने का कंद पैदावार और जड़ की लंबाई से सहसंबंध r = 0.70 रहा। गमला परीक्षण में इस आकार का सहसंबंध असली संकेत है। पर यह मात्रा-प्रतिक्रिया वक्र नहीं है, और ट्रॉली भर राख ख़रीदने से पहले वही चाहिए होता है।
फ़ॉस्फ़ोरस वह पोषक है जो भारत सबसे ज़्यादा बर्बाद करता है
फ़ॉस्फ़ोरस की एक दिक़्क़त है: जो डाला जाता है उसका ज़्यादातर हिस्सा पौधे तक पहुँचता ही नहीं। भारत में डाली गई फ़ॉस्फ़ेटिक खाद की वसूली दर क़रीब एक चौथाई है। बोरी का तीन-चौथाई फ़ॉस्फ़ोरस ऐसे रूपों में बँध जाता है जिन्हें फ़सल इस्तेमाल नहीं कर सकती — ख़ास तौर पर ग़लत pH वाली मिट्टी में।
इसीलिए वैकल्पिक फ़ॉस्फ़ोरस स्रोतों पर ध्यान उनके फ़ॉस्फ़ोरस की मात्रा से कहीं ज़्यादा जाता है। सामग्री को फ़ॉस्फ़ोरस से भरपूर होने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत यह है कि वह ऐसा फ़ॉस्फ़ोरस दे जिसे पौधा ले सके, या मिट्टी को ऐसा बदल दे कि जो फ़ॉस्फ़ोरस पहले से वहाँ है वह उपलब्ध हो जाए।
धान की भूसी की राख दूसरे काम के लिए भरोसेमंद उम्मीदवार है। वह क्षारीय है, छिद्रदार है, और सिलिका के साथ थोड़ी खनिज मात्रा रखती है। जिस अम्लीय मिट्टी में फ़ॉस्फ़ोरस बँधा पड़ा है, वहाँ pH ऊपर करना ख़ुद ही उस फ़ॉस्फ़ोरस को छोड़ने का तरीक़ा है।
यही बात दोनों तरफ़ काटती है — पहले से क्षारीय मिट्टी पर क्षारीय सुधारक pH को ग़लत दिशा में धकेलता है। — और वहाँ भी फ़ॉस्फ़ोरस उसी तरह बँध जाता है
कोई गमला परीक्षण आपको यह नहीं बताता कि आपकी अपनी मिट्टी कहाँ खड़ी है। मिट्टी की जाँच बताती है।
जो हिस्सा किसी ने माँगा नहीं था
यह नतीजा परीक्षण का मक़सद नहीं था, और सबसे दिलचस्प यही है।
खुदाई के क़रीब जानबूझकर सिंचाई रोकी गई — नमी का तनाव, इरादतन। जिन पौधों को राख मिली थी, उनमें पत्तियाँ सूखने में देर लगी। वे हरे और काम करते रहे, जबकि बिना उपचार वाले पौधे बंद होने लगे।
जो आलू का पौधा जल तनाव में छतरी ज़्यादा देर बनाए रखता है, वह कंद भी ज़्यादा देर भरता है। अगर यह असर खेत में टिकता है, तो यह बात कम पानी में आलू उगाने की चर्चा में आनी चाहिए, सिर्फ़ खाद की लागत की चर्चा में नहीं। वजह पोषण से ज़्यादा भौतिक लगती है — यही वजह है कि बायोचार पर भी अध्ययन होते हैं, और यही वजह है कि दोनों सामग्रियाँ हल्की, थकी मिट्टी में भारी उपजाऊ मिट्टी से ज़्यादा करती हैं।
यह क्या नहीं बताता
| आप क्या जानना चाहेंगे | परीक्षण क्या देता है |
|---|---|
| प्रति हेक्टेयर कितना डालें | जवाब नहीं — मात्राएँ ग्राम प्रति गमला हैं |
| खाद की जगह लेगा या साथ चलेगा | जवाब नहीं — प्रतिस्थापन परीक्षण हुआ ही नहीं |
| किस मिट्टी में फ़ायदा, किसमें नुक़सान | जवाब नहीं — एक मिट्टी, दो गमले |
| खेत में कंद पैदावार बढ़ेगी | गमलों में r = 0.70; खेत का आँकड़ा नहीं |
| मिल-दर-मिल राख बदलती है | इस पर बात नहीं हुई |
| फ़ॉस्फ़ोरस वाला असर असली है | हाँ — 17.8% और 14.6% की बढ़त |
आख़िरी से पहले वाली पंक्ति अपनी अलग लाइन की हक़दार है। धान की भूसी की राख मानक उत्पाद नहीं है। नियंत्रित बॉयलर की राख और खुले ढेर की राख एक ही नाम की दो अलग चीज़ें हैं।
फिर भी आज़माना हो तो: पहले मिट्टी का pH जाँचिए। पूरे खेत पर नहीं, एक पट्टी पर आज़माइए और बग़ल में बिना उपचार वाली पट्टी छोड़िए। इसके भरोसे अपनी फ़ॉस्फ़ोरस मात्रा मत घटाइए — प्रतिस्थापन यहाँ जाँचा ही नहीं गया। और राख एक ही स्रोत से लीजिए, हो सके तो एक ही मिल और एक ही खेप से।
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