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एक हेक्टेयर में औसतन कितना आलू होता है? भारत, केन्या और दुनिया की तुलना

FAO के मुताबिक़ 2024 में दुनिया की औसत आलू पैदावार 22.9 टन प्रति हेक्टेयर थी। भारत 24.6, केन्या 9.7 और न्यूज़ीलैंड 51.3। फ़र्क़ क्यों है और भारत की पैदावार कैसे बढ़े।

देवेंद्र कुमार झा · 08 नवंबर 2026 · 7 मिनट
भाषाहिन्दीEnglish
खुदाई के बाद क़तार में पड़े आलू: भारत 24.6, दुनिया 22.9, केन्या 9.7 टन प्रति हेक्टेयर
देवेंद्र के

विश्लेषण: देवेंद्र के · 8 नवंबर 2026

पोटैटो इंटेलिजेंस एक्सपर्ट · को-फ़ाउंडर, IndianPotato.com · LinkedIn पर फ़ॉलो करें →

सीधी बात

FAO के मुताबिक़ 2024 में दुनिया की औसत आलू पैदावार 22.9 टन प्रति हेक्टेयर थी। भारत में 24.6 टन प्रति हेक्टेयर हुई, जो दुनिया और एशिया के औसत से थोड़ी ऊपर है। 2026 की वर्ल्ड पोटैटो कांग्रेस के मेज़बान केन्या में 9.7 टन। सबसे ऊपर न्यूज़ीलैंड, 51.3 टन प्रति हेक्टेयर।

फ़र्क़ की वजह साफ़ बीज, किस्म का चुनाव, पानी, मशीन और स्टोरेज है। जहाँ किसान सर्टिफ़ाइड बीज लगाते हैं और सिंचाई करते हैं, वहाँ पैदावार दोगुनी हो जाती है।

2024 की पैदावार लीग: देश और क्षेत्र

नीचे हर बार एक ही पैमाने पर है, यानी जितनी लंबी लाइन, उतनी पैदावार। पतली काली लकीर दुनिया का औसत है। क्षेत्र गहरे रंग में, देश हल्के रंग में और भारत सुनहरे रंग में। अक्टूबर 2026 में केन्या के नैवाशा में हुई वर्ल्ड पोटैटो कांग्रेस में पैदावार पर ख़ूब बात हुई।

आलू की पैदावार, टन प्रति हेक्टेयरFAO, 2024 · पैमाना 0–55
न्यूज़ीलैंड51.3
अमेरिका50.9
उत्तरी अमेरिकाक्षेत्र48.2
ब्रिटेन46.6
जर्मनी45.0
ओशिनियाक्षेत्र42.7
फ़्रांस42.4
नीदरलैंड41.7
मिस्र30.1
यूरोपक्षेत्र25.2
भारत24.6
दुनिया का औसत22.9
एशियाक्षेत्र22.2
चीन20.8
दक्षिण अमेरिकाक्षेत्र20.4
रूस17.6
अफ़्रीकाक्षेत्र15.4
केन्या9.7
क्षेत्रदेशभारतदुनिया का औसत

दो बातें साफ़ दिखती हैं। पहली, टेबल के ऊपर वो देश हैं जहाँ सीज़न लंबा है, बीज सर्टिफ़ाइड है और खेती पूरी तरह मशीनों से होती है। न्यूज़ीलैंड और अमेरिका दोनों 50 टन प्रति हेक्टेयर के पार हैं। जर्मनी, फ़्रांस, नीदरलैंड और ब्रिटेन 40 टन से ऊपर।

दूसरी, यूरोप का औसत 25.2 टन बहुत बड़ा फ़ासला छिपाता है। पश्चिमी यूरोप के बड़े उत्पादक ऊपर हैं, जबकि महाद्वीप के सबसे बड़े आलू उत्पादकों में से एक रूस में 17.6 टन प्रति हेक्टेयर हुआ। रूस और यूक्रेन में अब भी बहुत सा आलू छोटे घरेलू खेतों में होता है, जो पूरे क्षेत्र का औसत नीचे खींचता है।

भारत आलू की पैदावार में कहाँ खड़ा है?

भारत टेबल के बीच से थोड़ा ऊपर है। 2024 में 24.6 टन प्रति हेक्टेयर के साथ भारत का एक हेक्टेयर दुनिया के औसत, एशिया के औसत और चीन के 20.8 टन से ज़्यादा देता है। चीन और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े आलू उत्पादक हैं, इसलिए यह तुलना दुनिया की सप्लाई के लिए मायने रखती है।

भारत की पैदावार दो दशकों में लगातार बढ़ी भी है। चुने हुए सालों का FAO रिकॉर्ड:

200418.8टन/हेक्टेयर
201422.9टन/हेक्टेयर
202325.8टन/हेक्टेयर
202424.6टन/हेक्टेयर

पैदावार हर सीज़न के मौसम के साथ ऊपर-नीचे होती है, इसलिए लंबी लाइन ऊपर जाते हुए भी कोई एक साल नीचे आ सकता है।

टेबल के ऊपर तक की दूरी अब भी बड़ी है। जो भारतीय खेत अच्छा बीज, ड्रिप या स्प्रिंकलर और प्लांटर इस्तेमाल करते हैं, वे पहले ही दिखा रहे हैं कि क्या मुमकिन है। काम यह है कि ये तरीक़े गंगा के मैदानों में हर खेत तक पहुँचें, जहाँ देश का ज़्यादातर आलू होता है। बीज की हालत पर हमारी रिपोर्ट भारत में आलू बीज की कमी में पढ़ें।

केन्या की पैदावार इतनी कम क्यों है?

केन्या बहुत आलू लगाता है और बहुत खाता भी है, पर हर हेक्टेयर जितना दे सकता है उससे कहीं कम देता है। कांग्रेस में वक्ता बार-बार इन्हीं कुछ वजहों पर लौटे।

  • घर का रखा बीज। अफ़्रीका का ज़्यादातर आलू पिछली फ़सल से बचाए बीज से होता है। सीज़न दर सीज़न वायरस बढ़ता जाता है और पैदावार गिरती जाती है।
  • सर्टिफ़ाइड बीज बहुत कम। KALRO के महानिदेशक डॉ. पैट्रिक केटिएम ने कांग्रेस में बताया कि केन्या को साल में करीब 1,50,000 टन सर्टिफ़ाइड बीज चाहिए, जबकि बनता करीब 24,000 टन है।
  • ज़्यादातर खेतों में एक ही किस्म। जल्दी तैयार होने वाली किस्म शांगी, जो किसानों और व्यापारियों को पसंद है, नेशनल पोटैटो काउंसिल ऑफ़ केन्या के आँकड़ों के हिसाब से केन्या के करीब 80% आलू रकबे पर है। एक ही किस्म इतनी ज़्यादा हो तो बीमारी आसानी से फैलती है।
  • छोटा रोटेशन और बारिश पर खेती। आलू उसी ज़मीन पर बहुत जल्दी लौट आता है, और ज़्यादातर खेत बारिश पर चलते हैं।

केन्या के पड़ोसी भी यही तस्वीर दिखाते हैं। FAO के मुताबिक़ 2024 में तंज़ानिया 8.7 और युगांडा 6.9 टन प्रति हेक्टेयर पर था।

अच्छी ख़बर भी है। रूटेड एपिकल कटिंग, यानी टिश्यू कल्चर से निकले वायरस-मुक्त पौधे जिन्हें बीज बनाने के लिए खेत में लगाया जाता है, इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर (CIP) की मदद से केन्या में फैल रही है। वक्ताओं ने कहा कि इससे बीज उगाने वालों को नई कमाई और आलू उगाने वालों को कहीं ज़्यादा पैदावार मिल रही है। इरिट्रिया के राष्ट्रीय रिसर्च संस्थान ने कांग्रेस में बताया कि बेहतर किस्मों, बेहतर खेती और किसानों की ट्रेनिंग से उनकी राष्ट्रीय पैदावार 13 से 16 टन प्रति हेक्टेयर हो गई।

देशों के बीच पैदावार में इतना फ़र्क़ क्यों?

टेबल के ऊपर और नीचे के बीच का ज़्यादातर फ़ासला छह बातों से समझ आता है।

वजह 01

साफ़, सर्टिफ़ाइड बीज

बीज बीमारी साथ लाता है। हर कुछ सीज़न में नया सर्टिफ़ाइड बीज वायरस को कम रखता है। पैदावार बढ़ाने की यह सबसे बड़ी चाबी है।

वजह 02

किस्मों की विविधता

बाज़ार और मौसम के हिसाब से कई किस्में बीमारी का जोखिम बाँट देती हैं। ज़्यादातर खेतों में एक ही किस्म इसका उल्टा करती है।

वजह 03

समय पर पानी

कंद भरते समय आलू को लगातार नमी चाहिए। दुनिया के सबसे सूखे देशों में से एक मिस्र सिंचाई से 30.1 टन प्रति हेक्टेयर लेता है।

वजह 04

मशीनें

प्लांटर, रिजर और हार्वेस्टर एक जैसी दूरी और गहराई रखते हैं, और खुदाई में चोट कम करते हैं।

वजह 05

सीज़न की लंबाई

लंबा, ठंडा सीज़न पौधे को ज़्यादा दिन काम करने देता है। भारत की छोटी सर्दी की फ़सल में कंद भरने के दिन कम मिलते हैं।

वजह 06

स्टोरेज

अच्छा कोल्ड स्टोर बीज की क्वालिटी बचाता है और किसान को सही दाम पर बेचने देता है, जिससे अगले सीज़न के बेहतर इनपुट का पैसा निकलता है।

जिन देशों ने मज़बूत आलू उद्योग बनाया है, उन्होंने बेहतर बीज, अच्छी किस्मों, मशीनीकरण, स्टोरेज और रिसर्च में पैसा लगाया है। — वाचिरा कागुओंगो, CEO, नेशनल पोटैटो काउंसिल ऑफ़ केन्या, वर्ल्ड पोटैटो कांग्रेस 2026

दुनिया का रुझान अच्छा है। FAO के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने कांग्रेस में बताया कि 2007 से 2024 के बीच दुनिया का आलू उत्पादन 20% बढ़ा जबकि रकबा 12% बढ़ा, यानी ज़्यादातर बढ़त बेहतर पैदावार से आई। इसी वजह से एशिया दुनिया का 53% आलू उगा पाता है।

भारत की आलू पैदावार कैसे बढ़े?

  • ज़्यादा सर्टिफ़ाइड बीज। ICAR-CPRI की सीड प्लॉट तकनीक, एरोपोनिक मिनीट्यूबर और एपिकल रूटेड कटिंग, तीनों से साफ़ बीज वहीं बन सकता है जहाँ लगना है।
  • हर खेत पर बीज बदलना। घर के रखे बीज की जगह तय समय पर नया सर्टिफ़ाइड बीज लेने से वायरस नहीं बढ़ता।
  • किस्मों की बड़ी टोकरी। गर्मी, झुलसा और प्रोसेसिंग के लिए बनी कुफ़री किस्में किसान को अपने बाज़ार और सीज़न के हिसाब से फ़सल चुनने देती हैं।
  • ड्रिप और स्प्रिंकलर। कंद भरते समय लगातार नमी टन जोड़ती है और पानी बचाती है।
  • प्लांटर और हार्वेस्टर। एक जैसी दूरी और हल्की खुदाई से पैदावार भी बढ़ती है और अच्छे दाम पर बिकने वाला हिस्सा भी।
  • किसान समूह। कांग्रेस में वक्ताओं ने कहा कि मिलकर काम करने से छोटे किसान बीज, मशीन और स्टोरेज साथ ख़रीद पाते हैं।

स्रोत: इंडियन पोटैटो इंटेलिजेंस

देवेंद्र के, पोटैटो इंटेलिजेंस एक्सपर्ट और IndianPotato के को-फ़ाउंडर
देवेंद्र के

देवेंद्र के पोटैटो इंटेलिजेंस एक्सपर्ट और IndianPotato.com व indianpotato.in के को-फ़ाउंडर हैं। वे भारत की आलू अर्थव्यवस्था, यानी भाव, प्रोसेसिंग, बीज, कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग, स्टोरेज और निर्यात पर लिखते हैं, और भारत में जगह बना रही प्रोसेसिंग, बीज और मशीन कंपनियों के साथ काम करते हैं। LinkedIn पर देवेंद्र के →

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दुनिया में आलू की औसत पैदावार प्रति हेक्टेयर कितनी है?
FAO के मुताबिक़ 2024 में दुनिया की औसत आलू पैदावार 22.9 टन प्रति हेक्टेयर थी। क्षेत्रों का औसत अफ़्रीका में 15.4 से लेकर उत्तरी अमेरिका में 48.2 टन प्रति हेक्टेयर तक था।
भारत में आलू की पैदावार प्रति हेक्टेयर कितनी है?
FAO के मुताबिक़ 2024 में भारत की आलू पैदावार 24.6 टन प्रति हेक्टेयर थी। यह दुनिया के औसत 22.9, एशिया के औसत 22.2 और चीन के 20.8 टन प्रति हेक्टेयर से ऊपर है।
आलू की सबसे ज़्यादा पैदावार किस देश में होती है?
FAO के मुताबिक़ 2024 में सबसे ज़्यादा राष्ट्रीय पैदावार न्यूज़ीलैंड की थी, 51.3 टन प्रति हेक्टेयर। अमेरिका 50.9 टन के साथ ठीक पीछे था।
केन्या में आलू की पैदावार प्रति हेक्टेयर कितनी है?
FAO के मुताबिक़ 2024 में केन्या की आलू पैदावार 9.7 टन प्रति हेक्टेयर थी, जो अफ़्रीका के औसत 15.4 से काफ़ी कम है। घर का रखा बीज, सर्टिफ़ाइड बीज की कमी और एक ही किस्म शांगी पर भारी निर्भरता इसकी मुख्य वजहें हैं।
यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आलू की पैदावार ज़्यादा क्यों है?
पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के किसान सर्टिफ़ाइड बीज लगाते हैं, सिंचाई करते हैं, बुवाई से खुदाई तक मशीनें इस्तेमाल करते हैं और उनका सीज़न लंबा होता है। जर्मनी, फ़्रांस, नीदरलैंड और ब्रिटेन, सबकी पैदावार 2024 में 40 टन प्रति हेक्टेयर से ऊपर रही।
भारत आलू की पैदावार कैसे बढ़ा सकता है?
घर के रखे बीज की जगह सर्टिफ़ाइड बीज, एरोपोनिक्स और एपिकल रूटेड कटिंग से ज़्यादा बीज, किस्मों की बड़ी टोकरी, ड्रिप या स्प्रिंकलर से पानी, और प्लांटर व हार्वेस्टर के इस्तेमाल से भारत अपनी पैदावार बढ़ा सकता है।
आलू की पैदावारटन प्रति हेक्टेयरFAOकेन्याबीज आलूवर्ल्ड पोटैटो कांग्रेस 2026
लेखक के बारे में
देवेंद्र कुमार झा
देवेंद्र कुमार झा
आलू उद्योग इंटेलिजेंस विशेषज्ञ

इंडियन पोटैटो के संस्थापक एवं निदेशक — आलू पर भरोसेमंद जानकारी (पोटैटो इंटेलिजेंस) और आलू से जुड़े हितधारकों का समुदाय खड़ा करने को समर्पित मंच। कृषि अभियांत्रिकी में बी.टेक; आलू के क्षेत्र के जानकार और इसके प्रति गहरा लगाव रखने वाले।

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