कुफ़री जमुनिया — बैंगनी गूदे वाला आलू और उसका बीज कहाँ मिलेगा
कुफ़री जमुनिया का गूदा अंदर तक बैंगनी है। पैदावार 32–35 टन/हे., पकने में 90–100 दिन, 32 mg एंथोसायनिन। खेती, पोषण और बीज का रास्ता — पूरी जानकारी।

ज़्यादातर रंगीन आलुओं को छीलो तो रंग वहीं ख़त्म हो जाता है। कुफ़री जमुनिया को काटो तो वह अंदर तक बैंगनी है — और यही इसकी पूरी बात है, क्योंकि एंटीऑक्सीडेंट छिलके के साथ छिलकर कूड़े में नहीं जाता। ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने इसे 2024 में जारी किया। पैदावार 32–35 टन प्रति हेक्टेयर है, पकने में 90–100 दिन लगते हैं, और भंडारण बिना कोल्ड स्टोर के भी चल जाता है। आज इसे अपनाने में एक ही असली अड़चन है, और वह खेत में नहीं है — बीज है।
छोटा जवाब
यह मंडी में क्विंटल के भाव बिकने वाली फ़सल नहीं, दाम देने वाले ख़रीदार के लिए बनी टेबल किस्म है। रंग ही माल है। खेती रबी की सामान्य आलू की खेती जैसी है, पैदावार अपनी श्रेणी की दूसरी किस्मों के बराबर है, और भंडारण सामान्य तापमान पर भी अच्छा चलता है। दो बातें ध्यान में रखिए: खेत में पछेती झुलसे के प्रति यह संवेदनशील है, और प्रमाणित बीज अभी सीमित मात्रा में ही निकलता है।
यह आलू है क्या
कुफ़री जमुनिया ICAR-CPRI शिमला की बायोफ़ोर्टिफ़ाइड टेबल किस्म है। संस्थान के अनुसार यह भारत की बैंगनी गूदे वाली पहली आलू किस्म है। यह MS/8-1148 × CP4242 के संकरण से निकली क्लोनल चयन है, और इसे तैयार होने में 10–12 साल लगे — आलू बीज से नहीं, कंद से बढ़ता है और एक पौधा औसतन 8–10 कंद ही देता है, इसलिए परीक्षण लायक़ मात्रा बनाने में ही बरसों चले जाते हैं। किस्म को 11 अगस्त 2024 को नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में कुफ़री चिप्सोना-5 और कुफ़री भास्कर के साथ सार्वजनिक किया गया।
नाम जामुन से आया है। यह काम ICAR-CPRI के डॉ. एस.के. लुथरा और उनकी टीम के लंबे बायोफ़ोर्टिफ़िकेशन कार्यक्रम का हिस्सा है, जिससे पहले कुफ़री नीलकंठ (2018) और कुफ़री माणिक (2021) निकल चुकी हैं — रंगीन छिलके से रंगीन गूदे तक का सफ़र। किस्म का पूरा विवरण पोटैटो जर्नल (खंड 52, अंक 2, 2025) में प्रकाशित है।
कटी हुई सतह ही पूरी दलील है — एंथोसायनिन पूरे कंद में है, सिर्फ़ छिलके में नहीं, इसलिए छीलने के बाद भी बचा रहता है।
कुफ़री जमुनिया बैंगनी गूदे वाली बायोफ़ोर्टिफ़ाइड किस्म है, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट और खनिज बढ़े हुए हैं। — डॉ. ब्रजेश सिंह, निदेशक, ICAR-CPRI, शिमला
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आलू को आम तौर पर सिर्फ़ कार्बोहाइड्रेट मान लिया जाता है। बैंगनी गूदा इसी धारणा को तोड़ता है — रंग सीधे एंथोसायनिन की मात्रा बताता है, वही यौगिक जो जामुन और बैंगनी अंगूर में मिलता है।
| पोषक तत्व | मात्रा (प्रति 100 ग्राम ताज़ा कंद) | किस काम का |
|---|---|---|
| विटामिन सी | 52 mg | रोग प्रतिरोधक क्षमता, कोलेजन |
| एंथोसायनिन | 32 mg | एंटीऑक्सीडेंट, सूजन-रोधी |
| कैरोटीनॉइड | 163 माइक्रोग्राम | आँख और कोशिका की सुरक्षा |
| शुष्क पदार्थ | 17–19% | भुरभुरी बनावट, टेबल उपयोग |
बात सिर्फ़ आँकड़ों की नहीं है। भारत में "छिपी भूख" यानी कैलोरी पूरी होने के बावजूद विटामिन और खनिज की कमी एक पुरानी समस्या है, और गाँव में ताज़े फल की खपत सीमित रहती है। ऐसे में जो पोषण रोज़ खाए जाने वाले आलू से मिल जाए, वह गोली या फ़ोर्टिफ़ाइड पैकेट से ज़्यादा भरोसे का रास्ता है। 2014 से 2022 के बीच भारत ने 16 फ़सलों में 87 बायोफ़ोर्टिफ़ाइड किस्में जारी की हैं; कुफ़री जमुनिया उसी कार्यक्रम की कड़ी है।
खेत में क्या माँगती है
खेती उत्तर भारत के मैदानों की सामान्य रबी आलू की खेती जैसी ही है। कुछ बातें इस किस्म के लिए ख़ास हैं।
- बुवाई का समय — उत्तरी मैदानों में अक्टूबर के मध्य से नवंबर के पहले हफ़्ते तक। 90–100 दिन की अवधि के हिसाब से खुदाई जनवरी के आख़िर से फ़रवरी के मध्य तक आती है, यानी गेहूँ या मक्का की अगली फ़सल के लिए समय बच जाता है।
- बीज — 30–40 ग्राम के प्रमाणित कंद। बुवाई से पहले अनुशंसित फफूँदनाशक से उपचार करें। सुप्तावस्था 6–8 हफ़्ते की है, इसलिए यह पक्का करें कि कंद की सुप्तावस्था टूट चुकी हो — प्रति कंद 2–3 स्वस्थ अंकुर सबसे अच्छा नतीजा देते हैं।
- मिट्टी — अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट से दोमट, pH 5.5–7.0। गहरी जुताई के बाद दो बार हैरो चलाकर भुरभुरी तैयारी करें, और अंतिम तैयारी से पहले 25–30 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद डालें।
- दूरी — कतार से कतार 60 सेमी, पौधे से पौधा 20 सेमी, कंद की गहराई 5–7 सेमी।
- सिंचाई — पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद, फिर मिट्टी की नमी देखकर 7–10 दिन के अंतर पर।
- खाद — NPK 150:80:100 किलो प्रति हेक्टेयर। आधी नाइट्रोजन और पूरी फ़ॉस्फ़ोरस-पोटाश बुवाई के समय आधार खुराक में; बची नाइट्रोजन पहली मिट्टी चढ़ाई पर, यानी बुवाई के क़रीब 25–30 दिन बाद।
सबसे ज़रूरी चेतावनी। पछेती झुलसे के प्रति यह किस्म प्रयोगशाला में मध्यम प्रतिरोधी पाई गई है, पर खेत में संवेदनशीलता देखी गई है। इसलिए इसे प्रतिरोधी मानकर छिड़काव टालना महँगा पड़ेगा — बुवाई के 45 दिन बाद से मैंकोज़ेब या साइमोक्सानिल + मैंकोज़ेब का निवारक छिड़काव शुरू करें और ज़्यादा नमी के दिनों में 7–10 दिन के अंतर पर दोहराएँ। साथ ही माहू (एफ़िड) की नियमित निगरानी रखें, क्योंकि वही विषाणु फैलाकर बीज की गुणवत्ता गिराता है।
खेती की पूरी प्रक्रिया के लिए आलू की खेती कैसे करें देखिए, और कुफ़री किस्मों की पूरी सूची में यह किस्म अपनी बिरादरी के साथ रखी है।
भंडारण — वह फ़ायदा जो अक्सर छूट जाता है
इस किस्म की सामान्य तापमान पर भंडारण क्षमता बहुत अच्छी बताई गई है। भारत में इसका मतलब बहुत बड़ा है, क्योंकि आलू का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोल्ड चेन के बाहर रखा जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में, जहाँ कोल्ड स्टोर की क्षमता माँग से कम है, खुदाई के बाद के कुछ हफ़्ते बिना नुक़सान निकल जाना सीधे-सीधे बेचने की मोहलत है — और मोहलत ही वह चीज़ है जो भाव तय करती है। इससे लंबे भंडारण के लिए टेबल आलू का सामान्य 2–4°C का कोल्ड स्टोर ही चाहिए। अपने ज़िले के ताज़ा भाव आलू भाव पर देखिए।
नीलकंठ और माणिक से फ़र्क़
| बात | कुफ़री जमुनिया (2024) | कुफ़री नीलकंठ (2018) | कुफ़री माणिक (2021) |
|---|---|---|---|
| छिलके का रंग | गहरा बैंगनी | गहरा बैंगनी-काला | लाल |
| गूदे का रंग | बैंगनी | क्रीम | पीला, लाल छल्लों के साथ |
| मुख्य पोषक | एंथोसायनिन + विटामिन सी | एंथोसायनिन + कैरोटीनॉइड | लोहा, ज़िंक, एंथोसायनिन |
| पैदावार (टन/हे.) | 32–35 | 35–38 | 30–33 |
| शुष्क पदार्थ | 17–19% | 18% | 18–19% |
| पकने की अवधि | 90–100 दिन | 90–100 दिन | 90–100 दिन |
फ़र्क़ की एक ही लाइन यह है: नीलकंठ का रंग छिलके पर रुक जाता है, जमुनिया का पूरे कंद में है। छीलकर पकाने वाली भारतीय रसोई में यही फ़र्क़ तय करता है कि एंटीऑक्सीडेंट थाली तक पहुँचेगा या कूड़ेदान तक। विदेशी लाल गूदे वाली किस्मों से तुलना के लिए मलबेरी ब्यूटी देखिए।
बैंगनी आलू ख़रीदना है — रेस्तराँ, दुकान या प्रोसेसिंग के लिए?
मात्रा बताइएबाज़ार कहाँ है
रंग बेचने वाली फ़सल के चार रास्ते साफ़ दिखते हैं।
प्रीमियम टेबल बाज़ार। शहरी ख़रीदार पोषण और दिखावट, दोनों के लिए ज़्यादा दाम देता है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका में बैंगनी आलू का अलग, स्थापित हिस्सा है और वहाँ वह ऊँचे दाम पर बिकता है। भारत के महानगरों और बड़े शहरों में ऑर्गैनिक तथा स्पेशियलिटी रिटेल वही जगह बना रहा है।
मूल्यवर्धन। ICAR-CPRI ने इससे दलिया, सूजी और आटा बनाने की प्रक्रिया बताई है — फाँकें सुखाकर हैमर मिल या पल्वराइज़र में पीसकर। अगर दलिया मुख्य उत्पाद हो तो लगभग 60% दलिया, 30% सूजी और 10% आटा निकलता है; सूजी मुख्य उत्पाद हो तो क़रीब 65% सूजी और 35% आटा। बैंगनी सूजी से हलवा, उपमा, डोसा बैटर और इडली बनती है।
निर्यात। रंगीन और स्पेशियलिटी आलू दुनिया भर में बढ़ता हुआ हिस्सा है, और भारतीय प्रवासी आबादी वाले बाज़ार — यूएई, सिंगापुर — पहली कोशिश के लिए सबसे नज़दीक हैं।
बीज उत्पादन। किस्म नई है और बीज की क़िल्लत ही आज की सबसे बड़ी अड़चन है। जो उत्पादक लाइसेंस लेकर ब्रीडर बीज बढ़ाएगा, वह उस माँग को पूरा करेगा जो 12 से ज़्यादा राज्यों में पहले से बनी हुई है। शुरुआती दौर में यही सबसे ज़्यादा मौक़े वाला हिस्सा दिखता है।
एक साफ़ बात, ताकि ग़लतफ़हमी न रहे: ऊपर के सभी दाम-संबंधी अनुमान बाज़ार की बनावट पर आधारित हैं, किसी मंडी में कुफ़री जमुनिया के दर्ज भाव पर नहीं। यह किस्म इतनी नई है कि उसका अपना भाव इतिहास अभी बना ही नहीं है।
भारत के आलू का पैमाना
यह किस्म ऐसे समय आई है जब देश का उत्पादन ऊँचे स्तर पर है। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक है, और क़रीब 22 लाख हेक्टेयर में आलू होता है।
| वर्ष | उत्पादन (लाख टन) | स्रोत |
|---|---|---|
| 2024–25 | 585.71 | PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2241379) |
| 2023–24 | 570.53 | PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2241379) |
| 2022–23 | 601.42 | PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2012191) |
| 2021–22 | 561.76 | PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2012191) |
उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब और मध्य प्रदेश — सभी बड़े उत्पादक राज्य इसी किस्म के सिफ़ारिश किए गए क्षेत्र में आते हैं। यानी अपनाने में भूगोल अड़चन नहीं है, बीज है।
बीज कहाँ से मिलेगा
औपचारिक रास्ता यही है: ब्रीडर बीज ICAR-CPRI शिमला और उसके क्षेत्रीय केंद्रों से निकलता है, फिर राज्य कृषि विश्वविद्यालय और लाइसेंस लेकर बीज बढ़ाने वाले उत्पादक उसे आगे बढ़ाते हैं। किस्म 2024 की है, इसलिए प्रमाणित बीज की मात्रा अभी सीमित है और हर मौसम में सबको नहीं मिल पाती।
व्यावहारिक सलाह दो हैं। पहली, पूछताछ बुवाई के मौसम में नहीं, उससे कई महीने पहले कीजिए — अक्टूबर में पूछने पर बीज नहीं मिलता। दूसरी, पूछते समय ज़िला, रक़बा और कितना बीज चाहिए, यह साफ़ लिखकर भेजिए; अस्पष्ट पूछताछ का जवाब सबसे बाद में आता है। बीज प्रणाली की बाक़ी रिपोर्टें भी इसी अड़चन के अलग-अलग हिस्सों पर हैं।
हम ICAR-CPRI के केंद्रों, प्रमाणित बीज उत्पादकों और बैंगनी आलू उगा रहे प्रगतिशील किसानों से जोड़ते हैं। अपना ज़िला, रक़बा और मात्रा भेजिए — और जो चीज़ उस मौसम में उपलब्ध नहीं है, वह हम साफ़ कह देते हैं। ठेके पर खेती और ख़रीद, दोनों पर बात हो सकती है।



