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बीज प्रणाली

कुफ़री जमुनिया — बैंगनी गूदे वाला आलू और उसका बीज कहाँ मिलेगा

कुफ़री जमुनिया का गूदा अंदर तक बैंगनी है। पैदावार 32–35 टन/हे., पकने में 90–100 दिन, 32 mg एंथोसायनिन। खेती, पोषण और बीज का रास्ता — पूरी जानकारी।

देवेंद्र कुमार झा · 21 सितंबर 2026 · 9 मिनट
भाषाहिन्दीEnglish
कुफ़री जमुनिया आलू — गहरे बैंगनी छिलके वाला कंद और कटा हुआ कंद, जिसका गूदा अंदर तक बैंगनी है

ज़्यादातर रंगीन आलुओं को छीलो तो रंग वहीं ख़त्म हो जाता है। कुफ़री जमुनिया को काटो तो वह अंदर तक बैंगनी है — और यही इसकी पूरी बात है, क्योंकि एंटीऑक्सीडेंट छिलके के साथ छिलकर कूड़े में नहीं जाता। ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने इसे 2024 में जारी किया। पैदावार 32–35 टन प्रति हेक्टेयर है, पकने में 90–100 दिन लगते हैं, और भंडारण बिना कोल्ड स्टोर के भी चल जाता है। आज इसे अपनाने में एक ही असली अड़चन है, और वह खेत में नहीं है — बीज है।

छोटा जवाब

यह मंडी में क्विंटल के भाव बिकने वाली फ़सल नहीं, दाम देने वाले ख़रीदार के लिए बनी टेबल किस्म है। रंग ही माल है। खेती रबी की सामान्य आलू की खेती जैसी है, पैदावार अपनी श्रेणी की दूसरी किस्मों के बराबर है, और भंडारण सामान्य तापमान पर भी अच्छा चलता है। दो बातें ध्यान में रखिए: खेत में पछेती झुलसे के प्रति यह संवेदनशील है, और प्रमाणित बीज अभी सीमित मात्रा में ही निकलता है।

32–35 टन/हे.
कंद की पैदावार
90–100 दिन
पकने की अवधि
17–19%
शुष्क पदार्थ

यह आलू है क्या

कुफ़री जमुनिया ICAR-CPRI शिमला की बायोफ़ोर्टिफ़ाइड टेबल किस्म है। संस्थान के अनुसार यह भारत की बैंगनी गूदे वाली पहली आलू किस्म है। यह MS/8-1148 × CP4242 के संकरण से निकली क्लोनल चयन है, और इसे तैयार होने में 10–12 साल लगे — आलू बीज से नहीं, कंद से बढ़ता है और एक पौधा औसतन 8–10 कंद ही देता है, इसलिए परीक्षण लायक़ मात्रा बनाने में ही बरसों चले जाते हैं। किस्म को 11 अगस्त 2024 को नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में कुफ़री चिप्सोना-5 और कुफ़री भास्कर के साथ सार्वजनिक किया गया।

नाम जामुन से आया है। यह काम ICAR-CPRI के डॉ. एस.के. लुथरा और उनकी टीम के लंबे बायोफ़ोर्टिफ़िकेशन कार्यक्रम का हिस्सा है, जिससे पहले कुफ़री नीलकंठ (2018) और कुफ़री माणिक (2021) निकल चुकी हैं — रंगीन छिलके से रंगीन गूदे तक का सफ़र। किस्म का पूरा विवरण पोटैटो जर्नल (खंड 52, अंक 2, 2025) में प्रकाशित है।

कुफ़री जमुनिया के गहरे बैंगनी आलू और एक कटा हुआ कंद, जिसका गूदा अंदर तक बैंगनी है

कटी हुई सतह ही पूरी दलील है — एंथोसायनिन पूरे कंद में है, सिर्फ़ छिलके में नहीं, इसलिए छीलने के बाद भी बचा रहता है।

कुफ़री जमुनिया बैंगनी गूदे वाली बायोफ़ोर्टिफ़ाइड किस्म है, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट और खनिज बढ़े हुए हैं। — डॉ. ब्रजेश सिंह, निदेशक, ICAR-CPRI, शिमला

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पोषण में क्या मिलता है

आलू को आम तौर पर सिर्फ़ कार्बोहाइड्रेट मान लिया जाता है। बैंगनी गूदा इसी धारणा को तोड़ता है — रंग सीधे एंथोसायनिन की मात्रा बताता है, वही यौगिक जो जामुन और बैंगनी अंगूर में मिलता है।

पोषक तत्वमात्रा (प्रति 100 ग्राम ताज़ा कंद)किस काम का
विटामिन सी52 mgरोग प्रतिरोधक क्षमता, कोलेजन
एंथोसायनिन32 mgएंटीऑक्सीडेंट, सूजन-रोधी
कैरोटीनॉइड163 माइक्रोग्रामआँख और कोशिका की सुरक्षा
शुष्क पदार्थ17–19%भुरभुरी बनावट, टेबल उपयोग

बात सिर्फ़ आँकड़ों की नहीं है। भारत में "छिपी भूख" यानी कैलोरी पूरी होने के बावजूद विटामिन और खनिज की कमी एक पुरानी समस्या है, और गाँव में ताज़े फल की खपत सीमित रहती है। ऐसे में जो पोषण रोज़ खाए जाने वाले आलू से मिल जाए, वह गोली या फ़ोर्टिफ़ाइड पैकेट से ज़्यादा भरोसे का रास्ता है। 2014 से 2022 के बीच भारत ने 16 फ़सलों में 87 बायोफ़ोर्टिफ़ाइड किस्में जारी की हैं; कुफ़री जमुनिया उसी कार्यक्रम की कड़ी है।

खेत में क्या माँगती है

खेती उत्तर भारत के मैदानों की सामान्य रबी आलू की खेती जैसी ही है। कुछ बातें इस किस्म के लिए ख़ास हैं।

सबसे ज़रूरी चेतावनी। पछेती झुलसे के प्रति यह किस्म प्रयोगशाला में मध्यम प्रतिरोधी पाई गई है, पर खेत में संवेदनशीलता देखी गई है। इसलिए इसे प्रतिरोधी मानकर छिड़काव टालना महँगा पड़ेगा — बुवाई के 45 दिन बाद से मैंकोज़ेब या साइमोक्सानिल + मैंकोज़ेब का निवारक छिड़काव शुरू करें और ज़्यादा नमी के दिनों में 7–10 दिन के अंतर पर दोहराएँ। साथ ही माहू (एफ़िड) की नियमित निगरानी रखें, क्योंकि वही विषाणु फैलाकर बीज की गुणवत्ता गिराता है।

खेती की पूरी प्रक्रिया के लिए आलू की खेती कैसे करें देखिए, और कुफ़री किस्मों की पूरी सूची में यह किस्म अपनी बिरादरी के साथ रखी है।

भंडारण — वह फ़ायदा जो अक्सर छूट जाता है

इस किस्म की सामान्य तापमान पर भंडारण क्षमता बहुत अच्छी बताई गई है। भारत में इसका मतलब बहुत बड़ा है, क्योंकि आलू का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोल्ड चेन के बाहर रखा जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में, जहाँ कोल्ड स्टोर की क्षमता माँग से कम है, खुदाई के बाद के कुछ हफ़्ते बिना नुक़सान निकल जाना सीधे-सीधे बेचने की मोहलत है — और मोहलत ही वह चीज़ है जो भाव तय करती है। इससे लंबे भंडारण के लिए टेबल आलू का सामान्य 2–4°C का कोल्ड स्टोर ही चाहिए। अपने ज़िले के ताज़ा भाव आलू भाव पर देखिए।

नीलकंठ और माणिक से फ़र्क़

बातकुफ़री जमुनिया (2024)कुफ़री नीलकंठ (2018)कुफ़री माणिक (2021)
छिलके का रंगगहरा बैंगनीगहरा बैंगनी-कालालाल
गूदे का रंगबैंगनीक्रीमपीला, लाल छल्लों के साथ
मुख्य पोषकएंथोसायनिन + विटामिन सीएंथोसायनिन + कैरोटीनॉइडलोहा, ज़िंक, एंथोसायनिन
पैदावार (टन/हे.)32–3535–3830–33
शुष्क पदार्थ17–19%18%18–19%
पकने की अवधि90–100 दिन90–100 दिन90–100 दिन

फ़र्क़ की एक ही लाइन यह है: नीलकंठ का रंग छिलके पर रुक जाता है, जमुनिया का पूरे कंद में है। छीलकर पकाने वाली भारतीय रसोई में यही फ़र्क़ तय करता है कि एंटीऑक्सीडेंट थाली तक पहुँचेगा या कूड़ेदान तक। विदेशी लाल गूदे वाली किस्मों से तुलना के लिए मलबेरी ब्यूटी देखिए।

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बाज़ार कहाँ है

रंग बेचने वाली फ़सल के चार रास्ते साफ़ दिखते हैं।

प्रीमियम टेबल बाज़ार। शहरी ख़रीदार पोषण और दिखावट, दोनों के लिए ज़्यादा दाम देता है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका में बैंगनी आलू का अलग, स्थापित हिस्सा है और वहाँ वह ऊँचे दाम पर बिकता है। भारत के महानगरों और बड़े शहरों में ऑर्गैनिक तथा स्पेशियलिटी रिटेल वही जगह बना रहा है।

मूल्यवर्धन। ICAR-CPRI ने इससे दलिया, सूजी और आटा बनाने की प्रक्रिया बताई है — फाँकें सुखाकर हैमर मिल या पल्वराइज़र में पीसकर। अगर दलिया मुख्य उत्पाद हो तो लगभग 60% दलिया, 30% सूजी और 10% आटा निकलता है; सूजी मुख्य उत्पाद हो तो क़रीब 65% सूजी और 35% आटा। बैंगनी सूजी से हलवा, उपमा, डोसा बैटर और इडली बनती है।

निर्यात। रंगीन और स्पेशियलिटी आलू दुनिया भर में बढ़ता हुआ हिस्सा है, और भारतीय प्रवासी आबादी वाले बाज़ार — यूएई, सिंगापुर — पहली कोशिश के लिए सबसे नज़दीक हैं।

बीज उत्पादन। किस्म नई है और बीज की क़िल्लत ही आज की सबसे बड़ी अड़चन है। जो उत्पादक लाइसेंस लेकर ब्रीडर बीज बढ़ाएगा, वह उस माँग को पूरा करेगा जो 12 से ज़्यादा राज्यों में पहले से बनी हुई है। शुरुआती दौर में यही सबसे ज़्यादा मौक़े वाला हिस्सा दिखता है।

एक साफ़ बात, ताकि ग़लतफ़हमी न रहे: ऊपर के सभी दाम-संबंधी अनुमान बाज़ार की बनावट पर आधारित हैं, किसी मंडी में कुफ़री जमुनिया के दर्ज भाव पर नहीं। यह किस्म इतनी नई है कि उसका अपना भाव इतिहास अभी बना ही नहीं है।

भारत के आलू का पैमाना

यह किस्म ऐसे समय आई है जब देश का उत्पादन ऊँचे स्तर पर है। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक है, और क़रीब 22 लाख हेक्टेयर में आलू होता है।

वर्षउत्पादन (लाख टन)स्रोत
2024–25585.71PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2241379)
2023–24570.53PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2241379)
2022–23601.42PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2012191)
2021–22561.76PIB, अंतिम अनुमान (PRID 2012191)

उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब और मध्य प्रदेश — सभी बड़े उत्पादक राज्य इसी किस्म के सिफ़ारिश किए गए क्षेत्र में आते हैं। यानी अपनाने में भूगोल अड़चन नहीं है, बीज है।

बीज कहाँ से मिलेगा

औपचारिक रास्ता यही है: ब्रीडर बीज ICAR-CPRI शिमला और उसके क्षेत्रीय केंद्रों से निकलता है, फिर राज्य कृषि विश्वविद्यालय और लाइसेंस लेकर बीज बढ़ाने वाले उत्पादक उसे आगे बढ़ाते हैं। किस्म 2024 की है, इसलिए प्रमाणित बीज की मात्रा अभी सीमित है और हर मौसम में सबको नहीं मिल पाती।

व्यावहारिक सलाह दो हैं। पहली, पूछताछ बुवाई के मौसम में नहीं, उससे कई महीने पहले कीजिए — अक्टूबर में पूछने पर बीज नहीं मिलता। दूसरी, पूछते समय ज़िला, रक़बा और कितना बीज चाहिए, यह साफ़ लिखकर भेजिए; अस्पष्ट पूछताछ का जवाब सबसे बाद में आता है। बीज प्रणाली की बाक़ी रिपोर्टें भी इसी अड़चन के अलग-अलग हिस्सों पर हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कुफ़री जमुनिया आलू क्या है?
यह ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला की बनाई बायोफ़ोर्टिफ़ाइड टेबल किस्म है, जो 2024 में जारी हुई। संस्थान के अनुसार यह भारत की बैंगनी गूदे वाली पहली आलू किस्म है। छिलका गहरा बैंगनी, गूदा बैंगनी, कंद अंडाकार और आँखें उथली होती हैं। पैदावार 32–35 टन प्रति हेक्टेयर और पकने की अवधि 90–100 दिन है। नाम जामुन से आया है, जिसके रंग से इसका गूदा मिलता है।
कुफ़री जमुनिया का बीज कहाँ से मिलेगा?
औपचारिक रास्ता ICAR-CPRI शिमला और उसके क्षेत्रीय केंद्र हैं, जहाँ से ब्रीडर बीज निकलता है, और उसके बाद राज्य कृषि विश्वविद्यालय तथा लाइसेंस लेकर बीज बढ़ाने वाले उत्पादक। किस्म नई है, इसलिए प्रमाणित बीज की मात्रा अभी सीमित है और यही अपनाने में सबसे बड़ी अड़चन है। रक़बा और ज़िला तय करके पहले से पूछताछ करना ज़रूरी है — बुवाई के मौसम में पूछने पर बीज मिलना मुश्किल होता है।
कुफ़री जमुनिया की पैदावार कितनी है?
अच्छी खेती की परिस्थितियों में कंद की कुल पैदावार 32–35 टन प्रति हेक्टेयर, यानी 320–350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। शुष्क पदार्थ 17–19% है, जो टेबल आलू के लिए ठीक बैठता है। यह अपनी श्रेणी की दूसरी मध्यम अवधि वाली किस्मों के बराबर है, इसलिए रंग के लिए पैदावार की क़ुर्बानी नहीं देनी पड़ती।
कुफ़री जमुनिया किन राज्यों के लिए है?
सिफ़ारिश हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड (मैदानी भाग), मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार के लिए है — यानी उत्तरी, मध्य और पूर्वी मैदानों का पूरा आलू क्षेत्र।
आलू का गूदा बैंगनी क्यों होता है?
रंग एंथोसायनिन से आता है — वही वर्णक जो जामुन, बैंगनी अंगूर और ब्लूबेरी में होता है और एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। कुफ़री जमुनिया में 100 ग्राम ताज़े कंद में 32 mg एंथोसायनिन, 52 mg विटामिन सी और 163 माइक्रोग्राम कैरोटीनॉइड होता है। कुफ़री नीलकंठ जैसी सिर्फ़ छिलके से रंगीन किस्मों में यह रंग छीलते ही निकल जाता है; यहाँ यह पूरे कंद में है।
कुफ़री जमुनिया और कुफ़री नीलकंठ में फ़र्क़ क्या है?
दोनों ICAR-CPRI की बायोफ़ोर्टिफ़ाइड किस्में हैं। कुफ़री नीलकंठ (2018) का छिलका गहरा बैंगनी-काला है पर गूदा क्रीम रंग का, इसलिए उसका एंटीऑक्सीडेंट मुख्यतः छिलके में है। कुफ़री जमुनिया (2024) में छिलका और गूदा, दोनों बैंगनी हैं। नीलकंठ की पैदावार थोड़ी ज़्यादा, 35–38 टन/हे. है।
क्या कुफ़री जमुनिया बिना कोल्ड स्टोर के रखी जा सकती है?
इसकी सामान्य तापमान पर भंडारण क्षमता बहुत अच्छी बताई गई है और सुप्तावस्था 6–8 हफ़्ते की है, इसलिए खुदाई के बाद कुछ हफ़्ते बिना कोल्ड स्टोर के निकल जाते हैं — बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में यह असली फ़ायदा है। इससे लंबे भंडारण के लिए टेबल आलू का मानक 2–4°C का कोल्ड स्टोर ही चाहिए।
कुफ़री जमुनिया से क्या-क्या बन सकता है?
थाली के आलू के अलावा ICAR-CPRI ने इससे दलिया, सूजी और आटा बनाने की प्रक्रिया बताई है — फाँकें सुखाकर हैमर मिल या पल्वराइज़र में पीसकर। बैंगनी सूजी से हलवा, उपमा, डोसा बैटर और इडली बनती है। प्रीमियम बैंगनी चिप्स और डिहाइड्रेटेड उत्पाद भी इसी से बनते हैं।
कुफ़री जमुनियाबैंगनी आलूबायोफ़ोर्टिफ़ाइड आलूICAR-CPRIआलू की किस्मेंबीज आलूएंथोसायनिन
लेखक के बारे में
देवेंद्र कुमार झा
देवेंद्र कुमार झा
आलू उद्योग इंटेलिजेंस विशेषज्ञ

इंडियन पोटैटो के संस्थापक एवं निदेशक — आलू पर भरोसेमंद जानकारी (पोटैटो इंटेलिजेंस) और आलू से जुड़े हितधारकों का समुदाय खड़ा करने को समर्पित मंच। कृषि अभियांत्रिकी में बी.टेक; आलू के क्षेत्र के जानकार और इसके प्रति गहरा लगाव रखने वाले।

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